सुधा मूर्ति प्रतिवर्ष हमारे देश को प्राकृतिक विनाश जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। चाहे वह गुजरात में आया भूकम्प हो या उड़ीसा की बाढ़, ये प्राकृतिक आपदाएँ सारे देश में तबाही मचा देती हैं। अक्सर देश इस प्राकृतिक तबाही से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। उन्हें यह स्थिति अस्त-व्यस्त कर देती है। इस कार्य के सिलसिले में मुझे पता चला कि भयंकर विपत्ति के बाद असंख्य लोग धन, कपड़े आदि वस्तुएँ भंडार कोष में दान देते हैं। हमारी यह सोच है कि समृद्ध व्यक्ति ही ज्यादा से ज्यादा धर्मार्थ दान करते हैं, परंतु वास्तविकता कुछ और ही है।
धनाढ्य लोगों की तुलना में मध्यमवर्गीय तथा निम्नवर्गीय व्यक्ति ऐसी स्थिति में ज्यादा मदद करते हैं। कुछ साल पहले बंगलोर की एक प्रतिष्ठित कंपनी ने मुझे एक समारोह के लिए आमंत्रित किया। कंपनी के समारोह में 'संयुक्त सामाजिक दायित्व' विषय पर मुझे भाषण देने के लिए कहा गया था। समारोह के अंतिम स्तर पर मेरी मुलाकात अनेक लोगों से हुई, जो कि इस कंपनी के कुशल कर्मचारी थे। वे आगे बढ़कर मुझसे मिलने आए। उन्होंने कहा कि मेडम क्या हम भूकम्प पीड़ित लोगों की सहायता कर सकते हैं? हमारे पास बहुत से कपड़े हैं, जो कि हम देना चाहते हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया से मैं बहुत खुश हुई। मैंने कहा कि वे अपनी वस्तुओं को बोरे में बाँधकर मेरे कार्यालय में पहुँचा दें।
एक सप्ताह के बाद मेरे कार्यालय में सामग्री के ढेर लग गए। मैं बहुत खुश थी कि मेरी बातों का उन पर प्रभाव पड़ा। रविवार के दिन मैं अपने सहयोगियों के साथ इन वस्तुओं को देखने लगी। जो दृश्य था उसे देखकर मैं दंग रह गई। थैले में ऊपर तक सामान भरा पड़ा था, परंतु वे सभी वस्तुएँ बेकार थीं। वस्तुओं में बिना जोड़ी के जूते, फटे कपड़े, बिना धुली हुई शर्ट, सस्ती साड़ियाँ और खिलौने जिनका न कोई आकार था, न रंग, न प्रयोग में आने वाली चादर, एल्युमीनियम के बर्तन, इन सभी चीजों का हमारे सामने ढेर लग गया था। | | एक सप्ताह के बाद मेरे कार्यालय में सामग्री के ढेर लग गए। मैं बहुत खुश थी कि मेरी बातों का उन पर प्रभाव पड़ा। रविवार के दिन मैं अपने सहयोगियों के साथ इन वस्तुओं को देखने लगी। जो दृश्य था उसे देखकर मैं दंग रह गई। |
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जिन लोगों के साथ मेरी मुलाकात हुई थी, वे सभी प्रतिष्ठित एवं समृद्ध व्यक्ति थे। अगर शिक्षित वर्ग के लोग ऐसा व्यवहार करते हैं तो अशिक्षित लोग कैसा बर्ताव करते होंगे?
इस घटनाक्रम ने मुझे मेरी बचपन से जुड़ी बातों को याद दिला दिया। मेरे दादाजी स्कूल से सेवानिवृत्त अध्यापक थे। मेरी दादीजी स्कूल नहीं गईं। दोनों बहुत ही कम यात्रा करते थे तथा कर्नाटक से कभी बाहर नहीं निकले। दादाजी और दादीजी बहुत ही परिश्रमी थे। वे हर काम अपने दिल से करते थे। बिना किसी उम्मीद के कि कोई उनकी मदद करेगा। वे प्रसिद्ध या जानी-मानी हस्ती नहीं थे, जिनके फोटो अखबार के पहले पन्नों पर छपते। दादा-दादीजी ने अपनी जिंदगी को जंगल में महकते फूलों के समान व्यतीत किया।
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