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जब मैंने दादी माँ को पढ़ना सिखाया  Search similar articles
- सुधा मूर्ति
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जब मैं बारह साल की बच्ची थी तब हमारा परिवार उत्तर कर्नाटक के एक गाँव में रहा करता था। उस समय तक परिवहन सेवाएँ आज के समय जितनी बेहतर नहीं हुआ करती थीं इसलिए हमें सुबह का अखबार दोपहर तक ही पढ़ने के लिए मिलता था। इसी तरह साप्ताहिक पत्रिका भी एक दिन बाद ही हाथ में आती थी। जिस बस से यह सामग्री गाँव आती थी उसका हम सभी बेहद उत्सुकता से इंतजार करते थे।

कन्नड़ भाषा की सुप्रसिद्ध लेखिका त्रिवेणी का लेखन जनसाधारण में बेहद पसंद किया जाता था। उनका लेखन बेहद सरल और आम जनजीवन से प्रभावित था। वे अक्सर मानवीय संवेदनाओं और ग्रामीण जीवन की जटिलताओं को बेहद खूबसूरत अंदाज में लिखती थीं।

आज से कई साल पहले त्रिवेणी का एक उपन्यास काशी यात्रा कन्नाड़ की साप्ताहिक पत्रिका कर्मवीरा में धारावाहिक के रूप में छपता था। इस उपन्यास में एक ऐसी वृद्ध महिला की कहानी थी जिसकी ख्वाहिश थी कि वह एक दिन काशी जाकर प्रभु विश्वेश्वर की आराधना करेगी। हिन्दू मतावलंबियों का मानना है कि काशी पूजा के बाद उनके पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष मिलता है।
  जब मैं बारह साल की बच्ची थी तब हमारा परिवार उत्तर कर्नाटक के एक गाँव में रहा करता था। उस समय तक परिवहन सेवाएँ आज के समय जितनी बेहतर नहीं हुआ करती थीं इसलिए हमें सुबह का अखबार दोपहर तक ही पढ़ने के लिए मिलता था।      


कहानी में महिला काशी जाने के लिए संघर्ष कर रही थी। इसी कहानी में एक अन्य कहानी साथ चलती है, जिसमें एक अनाथ गरीब लड़की और उसके विवाह की कठिनाइयों को दर्शाया गया है। यह लड़की एक युवा से प्रेम करती है लेकिन आर्थिक समस्याओं के चलते यह प्रेम विवाह में परिणत नहीं हो पाता। इस अनाथ गरीब कन्या की व्यथा को देखकर यह वृद्धा स्वयं की काशी यात्रा का सपना तजकर अपनी जमा पूँजी कन्या के विवाह पर खर्च कर देती है।

कहानी के अंत तक आते-आते वृद्धा के विचारों में काफी परिवर्तन आते हैं और वह मानने लगती है कि अनाथ लड़की की खुशी प्रभु पूजा से बढ़कर है, बल्कि यही सच्ची प्रभु-पूजा है। मेरी दादी कृष्ट्क्का कभी स्कूल नहीं गई, क्योंकि उनके समय में कन्या शिक्षा को कोई महत्व नहीं दिया जाता था। फलस्वरूप दादी अक्षरज्ञान से वंचित रह गईं। हमारे घर हर बुधवार को कर्मवीरा पत्रिका की प्रति आती थी।

इसी पत्रिका में त्रिवेणीजी का उपन्यास काशी धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हो रहा था। मेरी दादी को यह उपन्यास बेहद पसंद था। कर्मवीरा की प्रति आते ही दादी घर-बार के कामकाज से दूर बड़ी एकाग्रता से मुझसे इस उपन्यास की आगे की कहानी सुनती और उन्हें हृदय में उतारती थीं। कभी-कभी महसूस होता था कि दादी उस वृद्धा से अपनी तुलना करने लगी थीं।
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