- सुधा मूर्ति
बरसों पहले सन् 1974 में जब इंफोसिस केवल हमारी आँखों में झिलमिलाया ही था युवा नारायण मूर्ति एक फ्रांसीसी कंपनी 'सेसा' में काम करते थे, जो पेरिस में नए बने चार्ल्स द गाल हवाई अड्डे पर एयर कार्गो के लिए सॉफ्टवेयर बनाती थी। वे बहुत शर्मीले और आदर्शवादी थे।
जाड़े की एक सुबह इटली के एक कस्बे से चलकर वे तत्कालीन यूगोस्लाविया और बुल्गारिया के सीमावर्ती क्षेत्र 'निस' पहुँचे। एक बार कम्युनिस्ट इलाके में प्रवेश के बाद मूर्ति ने महसूस किया कि आसपास से गुजर रहे वाहन चालकों से यात्रा के लिए कहना आसान नहीं है। इसलिए उन्होंने 'सोफिया' के लिए ट्रेन पकड़ने का निश्चय किया। सोफिया बुल्गारिया की राजधानी थी। निस पहुँचकर वे सीधे स्थानीय रेलवे स्टेशन चले गए। एक रेस्टॉरेंट में सुबह का नाश्ता खरीदने की उनकी कोशिश नाकामयाब हो गई, क्योंकि वह उनके पास उपलब्ध इटली की मुद्रा स्वीकार नहीं रहा था और बैंक बंद थे।
मूर्ति रात आठ बजे सोफिया एक्सप्रेस के आने तक फ्लेटफॉर्म पर ही सो गए। प्रवासन संबंधी कार्यों को निपटाने हेतु ट्रेन वहाँ दो घंटे तक रुकी। मूर्ति ट्रेन में चढ़े और उन्होंने अपनी सीट ली। वे यह देखकर खुश हुए कि कंपार्टमेंट लगभग खाली था। एक अंतरमुखी व्यक्ति होने के नाते वे अकेले काफी खुश थे।
वे बैठकर एक किताब पढ़ रहे थे कि एक ऊँची खूबसूरत लड़की ने कंपार्टमेंट में प्रवेश किया और निकट की सीट पर बैठ गई। मूर्ति अपनी किताब में ही लगे रहे और उन्होंने एक मुस्कुराहट का आदान-प्रदान भी नहीं किया। आमतौर पर धरती के किसी भी हिस्से में औरतें बातूनी होती हैं। | | बरसों पहले सन् 1974 में जब इंफोसिस केवल हमारी आँखों में झिलमिलाया ही था युवा नारायण मूर्ति एक फ्रांसीसी कंपनी 'सेसा' में काम करते थे, जो पेरिस में नए बने चार्ल्स द गाल हवाई अड्डे पर एयर कार्गो के लिए सॉफ्टवेयर बनाती थी। |
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उस लड़की ने चुप्पी तोड़ी और बातचीत की शुरुआत की। जब उसे पता चला कि वे भारत से हैं, जो उस समय काफी हद तक 'साम्यवाद' और 'समाजवाद' का पक्षधर था तो स्वाभाविक रूप से बातचीत उनके देशों की विभिन्न नीतियों की ओर मुड़ गई। धीरे-धीरे उन्होंने अपने निजी जीवन के बारे में बातें शुरू कर दीं। लड़की ने अपनी स्थिति स्पष्ट की।
'मैं सोफिया से हूँ। मुझे मेरी पीएच-डी पूरी करने के लिए सरकार द्वारा छात्रवृत्ति पर कीव विश्वविद्यालय भेजा गया था। वहाँ मैं पूर्वी बर्लिन के एक युवक से मिली। हमने एक-दूसरे को पसंद किया और शादी करने का निश्चय किया', इतना कहते हुए वह शरमा गई।
फिर क्या हुआ? तुमने शादी क्यों नहीं की? मूर्ति ने सहानुभूतिपूर्वक पूछा। हमने शादी कर ली और यही समस्या थी। हमने अपनी सम्माननीय सरकारों को आवेदन दिया कि हमें एक-दूसरे राष्ट्र के नागरिक से विवाह करने की अनुमति प्रदान की जाए। वे मान गए, लेकिन बुल्गारिया सरकार चाहती थी कि मैं अपने देश में अपना निर्धारित काम पूरा करूँ जबकि मेरे पति को उतने समय तक पूर्वी जर्मनी में रुकने को कहा गया। परिणामस्वरूप मैं छः महीनों में एक बार पूर्वी जर्मनी जाती हूँ, जबकि मेरे पति भी छः महीनों में एक बार सोफिया आते हैं।
ये हम दोनों के लिए बहुत निराशाजनक हैं। हम एक सामान्य सामाजिक जीवन जीने की सारी आशाएँ खो चुके हैं, उसने कहा। मूर्ति ने उस कष्ट को महसूस किया, 'यह तो गलत तरीका है, चाहे देश पूँजीवादी हो या साम्यवादी, जीवनसाथी या काम के चुनाव में और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातों में कटौती नहीं होना चाहिए', उन्होंने कहा।
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