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विभाजन-रेखा
- सुधा मूर्ति

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अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं एक बड़े समूह का हिस्सा थी। समूह के सभी सदस्य उस देश का कोई न कोई हिस्सा घूमना चाहते थे। मैंने देखा, केवल मिसेज रूपा कपूर चुपचाप बैठी हैं। 75 वर्षीय वह महिला चेन्नई से थी। मैंने उनसे पूछा- क्या ऐसी कोई जगह है जहाँ आप जाना चाहती हैं।

उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा- 'मुझे पिंडी जाना है।' 'पिंडी कहाँ है, क्या ये कोई छोटा गाँव या शहर है- मैंने कहा। रूपा मेरी अज्ञानता पर हँसी और कहा, 'मेरा मतलब है रावलपिंडी, वहाँ के निवासी पिंडी कहते हैं।' 'आप कैसे जानती हैं क्या आप कभी वहाँ रही हैं।'

'मैं वहीं पैदा हुई और बड़ी भी' उन्होंने जवाब दिया। वो उन्नीस की उम्र तक रावलपिंडी में रही थीं। शादी के बाद वे चेन्नई में बस गईं, अब वहीं उनका घर था। लेकिन उनके मन में हमेशा यह इच्छा थी कि वे मौका मिलने पर अपने बचपन के घर को दुबारा देख पाएँ।

हममें से अधिकांश लोग पहले इस्लामाबाद जाना चाहते थे, मगर उन्होंने रावलपिंडी जाने पर जोर दिया। उन्हें एक साथी की जरूरत थी और मैं उनके साथ हो गई। वे बहुत उत्साहित थीं, उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं देखना चाहती हूँ उस घर को जहाँ मैं 57 साल पहले रहती थी। 'अच्छा विचार है,' मैंने कहा। इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर भेंट किए गुलदस्ते को याद कर मैंने कहा, 'जो भी वहाँ रह रहा होगा उसे मैं ये भेंट करूँगी।' इस बात ने उन्हें प्रभावित किया।

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जैसे ही कार इस्लामाबाद हवाई अड्डे से बाहर निकली, मिसेज कपूर मुझे किसी टूरिस्ट गाइड की तरह स्थानों के बारे में बताने लगीं। उन्होंने बाईं ओर एक पुरानी बिल्‍िडग दिखाकर कहा, 'वो बिजली के सामान की फैक्टरी थी। इसके मालिक केवलराम साहनी मेरे पिता के दोस्त थे। मैं और मेरे दोस्त लक्ष्मीपूजा के लिए दीपावली पर यहाँ आते थे।'

मैंने ड्राइवर को धीरे-धीरे चलाने को कहा ताकि वे यात्रा का आनंद ले सकें। कार सदर बाजार से गुजरी और उन्होंने एक पुरानी बिल्‍िंडंग के पास कहा- यहाँ मेरे पिता के कजिन रतन सेठी की जेवरात की दुकान थी, उनके पार्टनर मकबूल खान के साथ। इसे खान और सेठी के नाम से जाना जाताथा। मेरी शादी के गहने यहीं से बने थे।

उन्होंने कई इमारतें दिखाईं, जिनके साथ उनकी यादें जुड़ी थीं। लेकिन कई इमारतों को हटाकर आकाश चूमती हुई बिल्‍िडंग बन गई थी, जिन्हें देखकर वे भ्रमित हो जातीं। अचानक कार रुक गई, उसका एक पहिया पंक्चर हो गया था।ड्राइवर ने कहा कि इसे बनने में कुछ समय लगेगा। रूपा एक मिनट भी बेमतलब रुकना नहीं चाहती थीं, उन्होंने ड्राइवर से कहा- 'ठीक है तुम इसे बदलो तब तक मैं कुछ पुरानी जगहें घूम लूँ, तुम आगे से बाएँ और फिर दाएँ जाकर अगली मेन रोड पर हमें मिलो।'
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