- सुधा मूर्ति रमेश और शीला के नए घर का गृहप्रवेश का कार्यक्रम था। रमेश एक प्रोफेसर है और शीला बैंक में काम करती है। उनकी आमदनी अच्छी है, लेकिन उसमें से ज्यादातर उनके बड़े परिवार की देखरेख में खर्च हो जाता है। वास्तव में मैं जानती हूँ कि कुछ वर्ष पहले रमेश को अपनी बहन की शादी में बहुत अधिक धनराशि खर्च करना पड़ी थी। इस परिस्थिति में और जबकि बंगलूर में जमीन की कीमत बहुत तेजी से बढ़ रही है, ईमानदारी से कमाई करने वाले व्यक्ति के लिए घर खरीदना मुश्किल है। मैं जानती थी कि मेरे दोस्त ऐसा कर पाने की वजह से बहुत प्रसन्न हैं और गर्व का अनुभव कर रहे हैं।
घर बंगलूर के बाहरी इलाके में था। उसकी बनावट एकदम सामान्य थी और वो उनके परिवार की बनावट के लिहाज से बिलकुल सही था। मैं रमेश और शीला के चेहरे पर संतुष्टि का भाव देख सकती थी। हमारे कई पुराने दोस्त भी आए थे और हमने ढेर सारा समय आपस में गपशप करते हुए बिताया। लंच करने के ठीक बाद हम सभी घर के बाहर एक शेड में कुर्सियाँ डालकर बैठे हुए थे और पान के आने का इंतजार कर रहे थे।
तभी मैंने गेट के पास लगी एक पट्टिका की ओर ध्यान दिया। वह घर का नाम था 'श्याम कमल' चमकदार कालेग्रेनाइट पर उकेरा हुआ। मेरे अनुभव में लोग अपने घर का नाम या तो अपने नाम पर रखते हैं या अपने बच्चों के। या फिर यह उनके पूरे नाम पर होता है जैसे वैंकटेश्वर निलय या राघवेन्द्र प्रसाद अथवा बीरेश्वर कुरूप आदि। बाद में इस सूची में लव नेस्ट, सेवेंथ हैवेन और सुखविला,ऐश्वर्य विला जैसे नाम जुड़ गए। कला और साहित्य के प्रति झुकाव रखने वाले कुछ लोग अपने घर का नाम मेघदूत, नादस्वर, वर्षिनी आदि रखते हैं।
लेकिन श्याम कमल इनमें से किसी श्रेणी में ठीक नहीं बैठ रहा था। इसलिए मैंने पूछा शीला तुम्हारे घर का नाम श्याम कमल क्यों है? मैंने तो सिर्फ नीलकमल फिल्म का नाम ही सुना है। शीला और रमेश ने एक-दूसरे की ओर देखा। रमेश ने कहा- यह दो लोगों का संयुक्त नाम है, जिन्होंने हमारा जीवन बदल दिया और जिन्हें हम प्रतिदिन याद करते और धन्यवाद देते हैं।
इस बात से तुम्हारा क्या मतलब है? कौन हैं वो? मैंने पूछा।
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