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दोस्त
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महिलाओं के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि 'ईष्या का भाव उनमें जन्मजात होता है।' वह खाना-पीना छोड़ सकती है परंतु अपने से आगे बढ़ती या प्रशंसा पाती महिला को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती।

कभी किसी की सुंदरता, कभी किसी के ज्ञान तो फिर कभी किसी की तरक्की को देखकर इन्हें ईष्या होती है। इनके कानों में किसी दूसरी महिला की तारीफ के शब्द पड़ने मात्र की ही देर होती है कि ये आगबबूला होकर उसकी बर्बादी के लिए अपने अल्फाज व अपना वक्त दोनों जाया कर देती हैं।

इसमें अचरज की बात तो यह है कि दूसरे के बारे में अधिक सोचने के चक्कर में ये अपने आपको व अपनी जिम्मेदारियों तक को भूल जाती हैं। हो सकता है ये उस दूसरी महिला से कई गुना बेहतर हो परंतु ईर्ष्या के कालेपन में ये अपने गुणों रूपी स्वर्ण की चमक को मटमैला कर देती है तथा ईर्ष्या में ही अपनी जिंदगी के अनमोल पल बर्बाद कर देती है। ऐसा किसी एक महिला के साथ नहीं अपितु लगभग सभी महिलाओं के साथ होता है।

वो नहीं तो आप पहल करें :
दोस्ती एक ऐसा गोंद है, जो बिखरते रिश्तों को जोड़ने का काम करता है। यदि आप वाकई में किसी दूसरे से बेहतर बनना चाहते हैं तो क्यों न उसके दोस्त बनकर उससे स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा की जाए? इससे आपको रोज-रोज के अनावश्यक तनावों से तो मुक्ति मिल ही जाएगी साथ ही आपको एक नया दोस्त भी मिल जाएगा।

यदि आप अपने बड़प्पन व ओहदे के गुरूर में हमेशा सामने वाले के झुकने का इंतजार करेंगे या बार-बार वाणी से उसका तिरस्कार करेंगे तो माफ कीजिएगा आप बड़े होकर भी छोटे ही कहलाएँगे और धनवान होकर भी फटीचर ही कहलाएँगे क्योंकि जिसके पास नम्रता व शिष्टाचार की दौलत नहीं है, वह व्यक्ति धनवान होकर भी निर्धन, गुणी होकर भी अज्ञानी है।

नए रिश्तों को बनाने के लिए पहल तो किसी न किसी को करनी ही होगी। तो क्यों न वो शुरुआत आप ही से हो। यदि आप बार-बार अपने प्रतिद्वंदी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएँगे तो आज नहीं तो कल आप उसके दिल में एक विशेष स्थान पाने के हकदार हो जाएँगे और आप उसके सबसे अच्छे दोस्त बन जाएँगे।

जो बीत गया वो कल था :
बीती बातों को दोहराने वाला व्यक्ति कभी आगे नहीं बढ़ पाता है। ऐसा करने वाले व्यक्ति की सोच हमेशा सीमित ही रहती है। कई बार जाने-अनजाने हमारे मुँह से भी किसी के लिए अपशब्द निकल जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उससे बहुत अधिक नफरत करते हैं। यह सब तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है, जिससे वशीभूत होकर हम किसी का गुस्सा किसी पर उतार देते हैं।

कई बार प्यारवश हम अपने बच्चों को भी अपशब्द कह देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे उनके बीच गहरी दुश्मनी है। इसी प्रकार किसी शब्द या वाक्य को पकड़कर बार-बार उसे तूल देने से रिश्तों में कड़वाहट ही आती है।

इस कड़वाहट को मिटाने के लिए सबसे अच्छा उपाय है कि वर्तमान में जीना सीखा जाए तथा दुश्मन के आगे भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाए फिर देखिए दोस्ती की गर्मी से दुश्मनी की बर्फ पिघलती है या नहीं।
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