- अलका पुरंदरे अक्सर आपसी रिश्तों में हम अपने विचार व्यक्त करने में सकुचाते हैं। खासकर सास-बहू के नाजुक संबंधों में इसका अनुभव अधिक होता है। अगर बहू को सास से कुछ शिकायतें हों तो वह अपनी सास से कहने के बजाय दूसरों से उसकी बुराइयाँ करती फिरती है और अचानक ही पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार उसके निकट के हो जाते हैं। यही हाल सास का भी रहता है। जहाँ सासों की चौपाल जमी नहीं, वहीं शुरू हो जाता है बहुओं की बुराइयों का नित्य आख्यान। फिर तो सुनते रह जाइए। ऐसे चटखारे लेकर किस्से सुनाए जाते हैं कि सुनने वालों के मुँह से "च-च-च" के अलावा कुछ न निकले। | | धन की कोई कमी नहीं, लेकिन सीमित परिवार होने के कारण "अपने" कहलाने वाले लोग कम रह गए हैं। हम सभी को एक-दूसरे की आवश्यकता है। फिर घर के झगड़े देहरी लाँघ जाएँ तो परिवार टूटते देर नहीं लगती। |
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बहुओं की किटी पार्टियों का नजारा भी कुछ इन्द्रधनुषी रहता है। फैशन, गहनों के अलावा सास का विषय वरीयता क्रम में ऊपर का स्थान पाता है। एक से एक दुखड़े रोए जाते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि सास-शोषिता कौन अधिक है? यह किसी एक पक्ष की बात नहीं। जरूरी नहीं कि यह सब पर लागू हो, लेकिन अधिकांशतः ऐसा ही होता है। कुछ सासें ऐसी भी होती हैं, जो बहू को दहेज के लिए जला डालने वाली हों या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली हों। वहीं कुछ बहुएँ भी ऐसी होती हैं, जो सासों को नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य करती हैं। वैसे कुछ असाधारण उदाहरण छोड़ दिए जाएँ तो सास-बहू के आपसी मनमुटाव बातचीत द्वारा दूर हो सकते हैं। सास या बहू को अपनी बात एक-दूसरे से कहने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? अगर सास को बहू से कोई शिकायत है, तो किसी और को कहने के बजाय सीधे बहू से संवाद स्थापित कर अपनी बात रखे। जाहिर है, बहू को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। इसी बातचीत द्वारा समस्या का मध्य मार्ग निकलेगा। एक-दूसरे की भावनाओं और इच्छाओं का आदर करते हुए दिल को न दुखाने वाले शब्दों में अपनी बात कह सकते हैं। दूसरों के माध्यम से अपनी बुराइयाँ सुनकर मन आहत हो जाता है। आज की पीढ़ी की सास और बहू दोनों ही शिक्षित और समझदार हैं। समाज में हो रहे परिवर्तनों से खासी परिचित हैं। धन की कोई कमी नहीं, लेकिन सीमित परिवार होने के कारण "अपने" कहलाने वाले लोग कम रह गए हैं। हम सभी को एक-दूसरे की आवश्यकता है। फिर घर के झगड़े देहरी लाँघ जाएँ तो परिवार टूटते देर नहीं लगती। जब सब साथ रहते हैं तो विचारों में टकराव स्वाभाविक ही है। माँ-बेटी के मतभेदों को हम सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, किंतु जहाँ सास-बहू में वैचारिक मतभेद हों, वहाँ वे एक-दूसरे को खलनायिका निरूपित करने से भी नहीं कतरातीं। बेवजह छोटी-छोटी बातों को तूल देती हैं। जरूरी है कि सभी को अपने गिले-शिकवे-शिकायतें संवाद स्थापित कर आपस में शांति से बैठकर सुलझा लेने चाहिए। एक-दूसरे की छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने की आदत भी बना लें। अपनी सहनशीलता बढ़ाएँ यही सफल सहजीवन का मूलमंत्र है। |