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दोस्त या घुसपैठिया
निजी जीवन में घुसपैठ अच्छी नहीं
- दीपक हलव

दोस्त
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दोस्ती कितनी ही घनिष्ठ क्यों न हो, हर व्यक्ति की अपनी निजता होती है। इसमें घुसपैठ करना दोस्ती का गला घोंट सकता है। मछली को जिंदगी के लिए जिस प्रकार पानी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार व्यक्ति को अपने जीवन के लिए भाई-बहन, माता-पिता, सहकर्मी, रूम पार्टनर, नाते-रिश्तेदार और मित्रों की आवश्यकता होती है।

वह व्यक्ति जो इन सभी से तालमेल बैठाकर चलता है, वह मंजिल को पा जाता है। उसके व्यक्तिगत जीवन में सुख को बढ़ाने और दुःख को बाँटने के लिए किसी की बाट जोहने की आवश्यकता नहीं होती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति तालमेल के बजाय "हरकत" करता नजर आता है, उसे अकेलेपन में रहना होता है। पल दो पल की हरकतें आगे चलकर कुंठा का कारण बन जाती हैं जिससे बचा जाना चाहिए।

उपरोक्त सभी प्रकार के रिश्तों को लंबा और सुरक्षित करने के लिए आवश्यक है कि हम "दिखने में छोटी लेकिन घाव करे गंभीर" जैसी बातों पर गौर करें। मसलन, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजता होती है, उसका अपना स्वभाव होता है।

  आप अपने मित्र की अनुपस्थिति में उसके बैग को खोल रहे हैं, फाइलों को उलट-पलट रहे हैं, बैंक पास बुकों के बैलेंस देख रहे हैं, तो समझ लीजिए मित्रता अंतिम पायदान की ओर है। आप जब ऐसा कर रहे होते हैं, तब आप मित्रता की परिभाषा से बाहर निकल रहे होते हैं।      
यदि वह अपनी निजी बातें आपसे शेयर नहीं करना चाहता है और आप हैं कि मित्रता और रिश्तों को छोड़कर एक जासूस की तरह उसका पीछा कर रहे हैं, उसकी बगैर सिर-पैर की बातों को कहानीनुमा तारतम्य बैठाकर अपनी दिमागी शक्ति के अनुसार विश्लेषण कर दूसरे मित्रों को कुछ बताने की कोशिश में हैं तो समझ लीजिए आप मित्रता के दरवाजे अपने हाथों से बंद कर रहे हैं।

इसी प्रकार यदि आपको यह मालूम है कि आपका परिचित परेशान है, व्यथित है, लेकिन वह आपको अपनी बात नहीं बताना चाहता है, तो यह उसकी समझ है। उसे यह विश्वास भी हो सकता है कि इस समस्या से वह स्वयं निपट लेगा और फिर यह भी हो सकता है कि आपको समस्या बताने से वह सुलझेगी नहीं और आप उसे उलझा कर रख देंगे।

तो फिर उसे कुरेदना कहाँ तक जायज है? आपका मौन रहना भी मित्र को मदद करने जैसा ही है। आपको ऐसा सोचना चाहिए। उसकी निजता का सम्मान करना चाहिए। आपके रिश्ते कितने भी प्रगाढ़ क्यों न हों, सीमाओं के दायरे में होना चाहिए। आपको किसी का मोबाइल फोन हाथ में लेकर, उसमें से जानकारियाँ निकालकर पढ़ने और टीका-टिप्पणियाँ करने का कोई हक नहीं है, आप अपने मित्र के रूम पार्टनर हैं, तो भी क्या हुआ?

आप अपने मित्र की अनुपस्थिति में उसके बैग को खोल रहे हैं, फाइलों को उलट-पलट रहे हैं, बैंक पास बुकों के बैलेंस देख रहे हैं, तो समझ लीजिए मित्रता अंतिम पायदान की ओर है। आप जब ऐसा कर रहे होते हैं, तब आप मित्रता की परिभाषा से बाहर निकल रहे होते हैं। मित्रता त्याग और समर्पण पर टिकी रहती है।

आपके मित्र की गाढ़ी कमाई का पैसा आपके पास है तो वह किसी कारण से आपके पास है न कि आप यह समझ बैठें कि मित्र भूल गया है या फिर वह पैसे माँग नहीं रहा है तो मैं लौटाऊँ क्यों? आप अपने मित्र के साथ जीवन की यात्रा पर हैं, तो फिर पूर्ण मनोबल से तैयारी कर यात्रा करें कि आप स्वयं का खर्च स्वयं उठाएँगे। किसी भी प्रकार की चालाकी, डंडीमार प्रवृत्ति व अवसरवादिता "मित्र धर्म" में नहीं आती।
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