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मैं हूँ तुम्हारा डैडी!  Search similar articles
- टोनी लून

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विद्यार्थी खुशी-खुशी अंदर आए। उनके चेहरे गंदे थे, जैसे वे अभी-अभी समर कैंप से लौटे हों। वे एक-दूसरे का हाथ थामे हुए थे और वह गीत गा रहे थे, जो उन्होंने उस सप्ताह तैयार किया था। उनके चेहरों पर प्रेम और आत्मविश्वास का नया एहसास चमक रहा था।

जब मैं उससे पहली बार मिला था, तब वह चार साल की थी। मैं उस वक्त 29 साल का था और बुखार में पड़ा था। वह चार साल की भोली-सी बच्ची मेरे लिए सूप का बाऊल लेकर आई थी। उस समय मुझे जरा भी एहसास नहीं था कि यह छोटी लड़की मेरी जिंदगी बदल देगी।

मुद्दा यूँ था कि उसकी मम्मी और मैं कई सालों से दोस्त थे। धीरे-धीरे यह दोस्ती प्रेम में बदल गई। हमने शादी कर ली और शादी के बाद हम तीनों का एक परिवार बन गया। शुरू-शुरू में मुझे लग रहा था, क्योंकि मेरे दिमाग के किसी कोने में यह विचार था कि मुझ पर 'सौतेले पिता' का भयंकर लेबल लग जाएगा। सौतेले पिता काल्पनिक या शायद वास्तविक रूप में दुष्ट होते हैं। वे जाने-अनजाने में बच्चे और उसके वास्तविक पिता के बीच के खास रिश्ते में भी भावनात्मक बाधा बन जाते हैं। इसी विचार के चलते मैंने बच्ची का पिता बनने की प्रक्रिया को स्वाभाविक बनाने की कोशिश की। मैंने कोशिश की कि मैं दोस्त नहीं, बल्कि पिता की भूमिका निभाऊँ। मैंने अपनी इस बेटी और उसके बॉयलॉजिकल पिता के बीच में दीवार बनने की कोशिश नहीं की। बहरहाल, मैं उसके जीवन में खास जरूर बनना चाहता था। वक्त गुजरने के साथ ही मैं अपनी बेटी के गुणों को पहचानने की कोशिश करने लगा और उन्हें सराहने भी लगा। वह नन्हीं बच्ची दिल की बहुत साफ थी।
  विद्यार्थी खुशी-खुशी अंदर आए। उनके चेहरे गंदे थे, जैसे वे अभी-अभी समर कैंप से लौटे हों। वे एक-दूसरे का हाथ थामे हुए थे और वह गीत गा रहे थे, जो उन्होंने उस सप्ताह तैयार किया था।      


मैं जानता था कि इस लड़की के भीतर एक बहुत करुण और ममतामयी मनुष्य छिपा हुआ था। फिर भी मैं डर रहा था कि अगर मैंने उसे अनुशासित करने की कोशिश की तो वह मुझसे कह देगी कि मैं उसका वास्तविक पिता नहीं हूँ। अगर में वास्तविक पिता नहीं हूँ तो वह मेरी बात क्यों माने? मैं नाप-तौल कर कदम उठाने लगा। शायद मैं जरूरत से ज्यादा ढील देने लगा। मैं जान-बूझकर ऐसे काम कर रहा था, ताकि वह मुझे पसंद करे और उसको किसी बात का बुरा न लग जाए। मैं हर समय अभिनय कर रहा था, क्योंकि मैं यह सोच रहा था कि शायद वह मेरे वास्तविक रूप को पर्याप्त अच्छा नहीं मानेगी या पसंद नहीं करेगी, तो पिता रूप में स्वीकार नहीं करेगी।

कुछ समय बाद उसने किशोरावस्था में प्रवेश किया। किशोरावस्था के उथल-पुथल भरे वर्षों में हम भावनात्मक रूप से अलग होने लगे। ऐसा लग रहा था कि मेरा नियंत्रण (या नियंत्रण का अभिभावकीय भ्रम) खत्म हो रहा था। वह अपनी पहचान खोज रही थी। उसके साथ बातचीत करना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा था। हमारे बीच की शुरुआती निकटता के खत्म होने से मैं दुखी हो रहा था।
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