इसीलिए कई बार दूसरे नवजात शिशु के आगमन के साथ ही उसमें संघर्ष की भावना सिर उठाने लगती है। वयस्क सहोदरों में प्रतिद्वंद्विता की यह भावना यदि उन्माद की स्थिति तक पहुँच जाती है तो उसका मूल कारण माता-पिता द्वारा एक बच्चे का प्रत्यक्ष रूप से पक्ष लेना या परस्पर तुलना कर अन्य को हीन दर्शाना जैसे व्यवहार से व्यक्ति में यह विश्वास पैठ जाता है कि उसके अन्य भाई या बहन उससे श्रेष्ठ हैं जिससे उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।
खुल्लम-खुल्ला पक्षपात के साथ ही माता-पिता अपने बच्चों के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं। उससे उनके अबोध मन में गहरी छाप बन जाती है और वे स्वयं अपने बारे में विकृत सोच निर्मित कर लेते हैं जो बड़े होने तक कायम रहती है। वयस्क सहोदरों में झगड़े अक्सर वृद्ध माता-पिता की देखभाल तथा पैतृक संपत्ति को लेकर होते हैं। आज की दौड़भाग वाली जिंदगी में वृद्ध माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी परस्पर एक-दूसरे पर डालना चाहते हैं अथवा कभी-कभी किसी एक भाई या बहन द्वारा देखभाल करने पर उसे कई तरह के कटाक्ष या व्यंग्य कसने से बाज नहीं आते। वे यह समझते हैं कि यह देखभाल लालचवश की जा रही है।
सभी संबंध सुधर सकते हैं यदि सहोदर पूरी इच्छाशक्ति के साथ ईमानदारीपूर्वक एक-दूसरे को स्वीकार करना सीखें। वयस्क भाई-बहनों को विचार करना चाहिए कि उनकी बचपन की प्रतिद्वंद्विता उस संघर्ष का अवशेष है जिसकी शुरुआत में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
इस सचाई का अनुभव कर लें तो इससे उन्हें अपनी अपराध भावना या दोषारोपण की आदत से छुटकारा मिल जाएगा। अपने मन में पैठी प्रतिद्वंद्विता की भावना को खुलकर व्यक्त करना सबसे अच्छा कदम होगा। यदि कोई मनमुटाव भी हो तो अपने जीवनसाथी अथवा बच्चों के सामने अपने भाई या बहन को कुछ न कहते हुए अकेले में व्यक्त करें। एक-दूसरे की उपलब्धियों की प्रशंसा करें, सहयोग दें। अतीत की कड़वी यादों को दोहराने के स्थान पर कठिनाई में उलझे भाई-बहन की मदद करें।
उनके दु:खों में शामिल हों तथा सांत्वना दें। घर में मिलने पर यदि पुराने जख्म हरे होते हों तो किसी अन्य स्थान पर मिलें। दूर रहने पर पत्र लिखें। जन्मदिन या त्योहारों पर शुभकामनाएँ प्रेषित करें। एक-दूसरे को समझने की चेष्टा करें न कि हावी होना चाहें। सभी के विचार भिन्न होते हैं, अत: जरूरी नहीं कि आपके विचारों से सारे लोग सहमत हों। ऐसे में बहस को कतई स्थान न दें। त्योहारों को मिलजुलकर मनाएँ।
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