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सामाजिक संरचना में रिश्तों का महत्व
- दीक्षा चौबे

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सामाजिक संरचना में रिश्तों का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रेम के महीन रेशों से बुने ये रिश्ते अत्यंत नाजुक होते हैं। भाई-बहन, दोस्त, पति-पत्नी, चाचा, मामा इत्यादि रिश्तों का रूप चाहे जो भी हो, ये सभी विश्वास, आदर, ईमानदारी एवं समर्पण की माँग करते हैं। रिश्तों की इस बेल को स्नेह, त्याग एवं विश्वास के जल से सींचना अनिवार्य है, नहीं तो यह असमय ही मुरझा जाती है।

कई बार वर्षों के प्रेम संबंध छोटी-छोटी बातों, गलतफहमियों या अफवाहों के कारण टूट जाते हैं। बहुत ही सोच-समझकर, सही-गलत का परीक्षण कर संबंध तोड़ना चाहिए क्योंकि एक बार संबंध खराब हो गए तो फिर वह मिठास वापस नहीं आती। रहीम कवि ने इसी बात पर कहा है- 'रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुरै, जुरै गाँठ पड़ जाए।'

प्रेम के तारों में गुँथे रिश्तों को बहुत ही सहेजकर रखना चाहिए, उतावलापन इन संबंधों के लिए घातक है। कुछ बिंदुओं पर गौर करें।
  सामाजिक संरचना में रिश्तों का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रेम के महीन रेशों से बुने ये रिश्ते अत्यंत नाजुक होते हैं। भाई-बहन, दोस्त, पति-पत्नी, चाचा, मामा इत्यादि रिश्तों का रूप चाहे जो भी हो, ये सभी विश्वास, आदर, ईमानदारी एवं समर्पण की माँग करते हैं।      


व्यवहार में रखें मर्यादा
विनीत और नीलेश बहुत अच्छे दोस्त थे। बातों ही बातों में एक बार विनीत ने नीलेश के परिवार के संबंध में अमर्यादित टिप्पणी कर दी, जिससे वह आहत हो गया और उसने विनीत से मिलना, बात करना बंद कर दिया। मजाक में भी किसी की भावना आहत न हो, इसका हमें ख्याल रखना चाहिए।

एक-दूसरे की भावना का आदर करना
कोई बात हमें अच्छी लगती है, जरूरी नहीं कि वह सभी को अच्छी लगे। दूसरों के विचारों, भावनाओं का आदर करके हम उनके दिल में जगह बना सकते हैं और अपने संबंध मजबूत कर सकते हैं।
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