- प्रिया सुधीर शुक्ल पूर्वा के पास कल माँ का फोन आया था। माँ की आवाज बहुत थकी लग रही थी। माँ ने बताया कि उन्हें दो दिन से बुखार आ रहा है। बाबूजी की खाँसी भी ठीक नहीं हो रही थी इसीलिए टेस्ट करवाए थे। डायबिटीज निकला है, दवाइयाँ चल रही हैं, बहुत सारा पथ्य बताया है। पूर्वा चुपचाप माँ की बातें सुनती रही। माँ हर लाइन के बाद कह रही थी- पूर्वा तू चिंता मत करना बेटा, डरने जैसी कोई बात नहीं, उम्र हो गई है। ये सब तो चलेगा ही, तू ज्यादा सोचना मत। पूर्वा रातभर सो नहीं पाई।
ऐसी कई पूर्वाएँ हैं, जिनके जीवन का सच लगभग ऐसा ही है। माता-पिता जितने कष्ट सहकर बेटों को बड़ा करते हैं, उतनी ही हसरतों, कष्टों से बेटी को भी पालते हैं। शादी के बाद वे दूसरे घर की हो जाती हैं। उसके आसपास पत्नी, बहू, माँ, भाभी, मामी-चाची इन तमाम रिश्तों की सीमाएँ होती हैं। ऐसे में वह किसी की बेटी भी है, यह भाव गौण हो जाता है। अक्सर ऐसा होता है।
मायके से आया फोन या संदेश मन-मस्तिष्क में हलचल मचा देता है, पर आवश्यकता होने पर भी वह दौड़कर मायके नहीं जा पाती। फोन पर सलाह देती बेटी कि अपनी तबीयत का ख्याल रखना, दवाइयाँ समय से लेना, आराम करना, मन के किसी कोने में स्वयं को अपराधी महसूस करती है, क्योंकि वह जानती है कि उसके माता-पिता कितनी परेशानी में होंगे।
उन्हें खिचड़ी तक बनाकर देने वाला भी कोई नहीं होगा। बाजार से दवाइयाँ मँगवाने के लिए भी वे दूसरों पर निर्भर होंगे। लेकिन बेटी की मायके न जाने की मजबूरियाँ अनगिनत हैं। बच्चे का स्कूल है, दूसरे बच्चे के टेस्ट चल रहे हैं। घर में सास गठिया की मरीज है, उठ नहीं पाती, पति का टिफिन कौन बना देगा?
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