- राजेश कुमार व्यास
डीजे के धमाकेदार संगीत से सजी शाम, सिर्फ 'चखने' के लिए प्लेटें भरते 'भरे पेट' लोग और नुमाइश बने ब्रांडेड कपड़े। एसेसरीज हर बार बहुत हद तक ऐसा ही तो होता है हमारी न्यू इयर पार्टी का स्वरूप। तो चलिए इस बार सजाएँ एक नया संकल्प। उनके लिए जिन्हें 'भूख' लगती है और जो हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जूठन तक को छप्पन भोग मान लेते हैं।
वह एक टी-स्टॉल के बाहर सर्द गहराती दिसंबर की शाम थी। बैंचों पर बैठे तीन-चार युवाओं में गपशप चल रही थी। बातें चलती हुईं न्यू इयर रेजल्यूशन की ओर मुड़ गई। वे अपने-अपने संकल्प बताने लगे-इस वर्ष के अंत तक कार खरीदने का, गुटखे की आदत छोड़ने का, जल्दी उठकर जॉगिंग करने का और आय को पाँच अंकों तक पहुँचाने का।
अचानक किसी ने न्यू इयर पार्टी की बात छेड़ दी। चूँकि वे सभी इस बात पर एकमत थे कि इस पार्टी का असली मजा तो कहीं होटल जाकर मनाने में ही है। इसलिए वे जगह का निर्णय करने लगे। तभी मेरा ध्यान चूल्हे के पास उँकडू बैठे बन्टू पर गया। वह कभी-कभार कॉलोनी में पुरानी बोतलें और प्लास्टिक खरीदने के लिए घूमता दिख जाता था। उसे बड़े गौर से वे बातें सुनते देख मैंने पूछा-'क्यों रे बन्टू, न्यू इयर पर तेरा क्या प्रोग्राम है?' मेरी बात सुनते ही वह एकदम से खिल उठा-'झकास मजा लूटते हैं साब अपन तो इस दिन की पार्टी का।'
'कैसा मजा?' मुझे उसकी बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी थी।
'साब, अपन सुबह-सुबह नए साल में बोतल बीनने निकलते हैं। कसम से साब, जित्ती बोतलें साल भर में कभी नी मिली, उत्ती इस दिन मिल जाती हैं, वो भी फोकट...और कोल्ड्रिंग का मजा अलग', उसने चहकते हुए कहा।
ओह! तो यह था उसकी खुशी का राज।
सच है, जो गरीब चंद प्लास्टिक के टुकड़ों और बोतलों के लिए दिनभर गली-गली भटकता हो, उसके लिए वे ढेर सारी बोतलें और जूठा कोल्ड्रिंक यदि लॉटरी खुलने के समान हो तो इसमें आश्चर्य काहे का। लेकिन न्यू इयर का अर्थ किसी के लिए ऐसा भी हो सकता है,यह बात मुझे अंदर तक हिला गईं।
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