* बच्चों के स्कूल जाएँ :- माता-पिता को बच्चों के स्कूल जाकर उसके शिक्षकों, सहपाठियों व मित्रों की जानकारी रखनी चाहिए। उन्हें स्कूल का माहौल भी देखना चाहिए। जिससे पता चल सके कि बच्चा स्कूल में क्या-क्या करता है। क्या स्कूल में आपके बच्चे को कमजोर कहकर उसका मजाक उड़ाया जाता है या उसे क्लासरूम से बाहर निकाल दिया जाता है। | | मजाक की बातों को भी कई बार बच्चे इतनी गंभीरता से ले लेते हैं कि वे बगैर कुछ सोचे-समझे हिंसक कदम उठा लेते हैं। बच्चे कच्ची माटी के समान होते हैं जिन्हें जैसा ढालोगे, वो वैसे ही ढल जाएँगे। |
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यह सब आपको बच्चे के स्कूल जाने पर ही पता चलेगा। बच्चे को कोई भी परेशानी होने पर उसके शिक्षकों से इस संबंध में बात करें। बच्चों के शिक्षकों से भी उसके साथ मारपीट की बजाय सुधारात्मक रवैया अपनाने को कहे। प्यार से दी गई समझाइश बच्चे की जिंदगी बदल सकती है। ऐसा किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि पढ़ाई में कमजोर बच्चे कभी आगे नहीं बढ़ सकते। * प्यार से समझाएँ :- आए दिन यह सुनने में आता है कि अमुक बच्चे ने दूसरे बच्चे की खिल्ली उड़ाई तो दूसरे दिन उस बच्चे ने कुंठा से ग्रस्त होकर आत्महत्या कर ली। ऐसी घटनाएँ अब एक आम बात हो गई है। मजाक की बातों को भी कई बार बच्चे इतनी गंभीरता से ले लेते हैं कि वे बगैर कुछ सोचे-समझे हिंसक कदम उठा लेते हैं। बच्चे कच्ची माटी के समान होते हैं जिन्हें जैसा ढालोगे, वो वैसे ही ढल जाएँगे। उन्हें समझाने के लिए प्यार की आवश्यकता है। कई बार जो काम वे आपकी डाँट पर नहीं करते वही काम वह आपके प्यार से समझाने पर कर देंगे। |