हर बात में माँ-बाप से 'ना' का जवाब सुनते-सुनते तंग आकर बच्चे उनसे कुछ पूछना ही बंद कर देते हैं। हमेशा नकारात्मक होने की बजाय कभी-कभी बच्चों के साथ 'सकारात्मक रवैया' भी अपनाएँ जिससे बच्चे आपको अपने मन की बात बताने में कोई झिझक या परेशानी महसूस न करें। * बदल गया है ज़माना :- कुछ माँ-बाप अक्सर अपने गुजरे जमाने की बातों का उदाहरण बच्चों को देते हैं लेकिन आज के बदलते दौर में उनमें से हर बात प्रासंगिक हो, यह संभव नहीं है। अब जमाना बदल गया है। जिससे लोगों की सोच में भी बदलाव हुआ है। | | माँ-बाप यदि बच्चों के साथ हमेशा दूरी बनाकर चलेंगे तो बच्चों और उनके बीच में दूरी हमेशा बढ़ती ही जाएगी। आजकल के बच्चों को डाँटने वाले माँ-बाप नहीं बल्कि उनको समझने वाले दोस्त की जरूरत होती है। |
| |
आजकल स्कूलों और कॉलेजों में लड़के-लड़कियाँ दोनों ही एक साथ पढ़ते हैं। ऐसे में यदि माँ-बाप चाहें कि उनका लड़का, लड़कियों से या लड़की, लड़कों से बात न करे। तो शायद यह संभव नहीं है। माँ-बाप को चाहिए कि वे बदलते समय के हिसाब से अपनी सोच को भी बदलें। * माँ-बाप के साथ ही दोस्त भी बनें :- माँ-बाप यदि बच्चों के साथ हमेशा दूरी बनाकर चलेंगे तो बच्चों और उनके बीच में दूरी हमेशा बढ़ती ही जाएगी। आजकल के बच्चों को डाँटने वाले माँ-बाप नहीं बल्कि उनको समझने वाले दोस्त की जरूरत होती है। बच्चों के साथ तालमेल बिठाकर माँ-बाप के साथ बच्चों का एक बेहतर रिश्ता कायम हो सकता है। समय मिलने पर आप बच्चों से उनके अनुभव बाँटें। उनके साथ दोस्त बनकर कहीं बाहर घूमने जाएँ फिर देखिए बच्चे आपका कितना आदर करते हैं। तो क्यों न आज ही से पुराने दकियानलूसी विचारों को त्यागकर अपने बच्चों के साथ दोस्ती का एक नया रिश्ता कायम करें। एक ऐसा रिश्ता जो प्यार, अपनापन और सामंजस्य की डोर से बँधा हो। |