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मुझे लौटा दो मेरा बचपन
गायत्री शर्मा
पढ़ाई का बोझ
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बचपन रंगीला होता है। हर रोज नई-नई शरारतें करना, अपनी मनमानी करना... बस यही तो बचपन की निशानी है। यह उम्र एक ऐसी उम्र होती है जब बच्चा बगैर किसी तनाव के अपनी ही मस्ती में मस्त रहता है।

गुड्डे-गुडियों के खेल, बरखा के गीत, गिल्ली-डंडे... ये सब क्या होता है शायद आज हमारे बच्चे ये नहीं जानते। आज के बच्चों के पास तो इन सभी के लिए वक्त ही नहीं है। उन्हें तो पढाई, योगा क्लासेस, डांस क्लासेस से समय मिले तो वे इसके बारे में कुछ सोचें। उनका बचपन तो बस दूसरे बच्चों से प्रतिस्पर्धा करने में ही बीत जाता है। ये खेल क्या होते हैं बच्चे नहीं जानते

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा ऑलराउंडर बने, पर अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए वे बच्चे पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ डाल देते हैं जिससे बच्चा ऑलराउंडर तो बन जाता है पर उसका बचपन उससे छिन जाता है
  बच्चे उस कोमल फूल की तरह होते हैं जो स्पर्श से ही कुम्हला जाता है। उन्हें अच्छी शिक्षा देना हर माता-पिता का कर्तव्य है किंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि बच्चों को किताबों में ही केवल कैद कर दिया जाए।      


नर्सरी कक्षा में पढ़ने वाली आशी के थोड़ी सी देर खेलता देखकर उसकी मम्मी ने उसे जोर का तमाचा मारा, जिसका एकमात्र कारण यह थकि कहीं पड़ोस वाले शर्माजी की बच्ची उससे पढ़ाई में आगे नहीं निकल जाए। रोज सुबह स्कूल से आने के बाद होमवर्क करना, फिर डांक्लास और उसके बाद ट्यूशन जाना यही दिनचर्या है आशी की

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