सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में जहाँ कम्प्यूटर ने हर घर में अपनी पकड़ बना ली है वहीं इसके दुष्परिणाम से भी लोग अछूते नहीं हैं। बटन पर क्लिक करते ही तमाम जानकारियों का खजाना हमारे सामने होता है। हर कोई आसानी से किसी भी साइट पर जाकर वांछित जानकारी प्राप्त कर सकता है।इंटरनेट एक ओर हमें दुनियाभर की जानकारियाँ परोस रहा है वहीं दूसरी ओर अश्लील साहित्य परोसने में भी इसका कोई सानी नहीं है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। इस भागदौड़ की जिंदगी में संस्कार जैसे बीते जमाने की बात बन गए हैं। आज माँ-बाप के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व अच्छा माहौल दें। सुबह होते ही माँ-बाप दफ्तर निकल जाते हैं और अपने बच्चों को छोड़ जाते हैं टी.वी. और इंटरनेट के भरोसे। उनकी इसी लापरवाही व अनदेखी का परिणाम ही है कि परिपक्वता की उम्र से पूर्व ही बच्चे अश्लीलता की बातें करने लगते हैं। | | बच्चे वहीं करते हैं जिसे करने से उन्हें अक्सर मना किया जाता है। दूसरों के सामने उन्हें जो नहीं देखने दिया जाता है वह बच्चे अकेले में देखकर अपने मन की संतुष्टि करते हैं और यहीं से शुरुआत होती है भटकाव की। |
| |
बच्चे कच्ची माटी के समान होते हैं। इस उम्र में उन्हें जैसे संस्कार दिए जाएँगे, वे वैसे ही ढल जाएँगे। इस दुनिया को देखने का उनका एक अलग नजरिया होता है। बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं जिनसे वे अनभिज्ञ होते हैं। उनके मन में बहुत सारे सवाल उठते हैं जिनका यदि उचित प्रकार से निराकरण कर दिया जाए तो बच्चे उनका जवाब कहीं और नहीं तलाशेंगे। बच्चे वहीं करते हैं जिसे करने से उन्हें अक्सर मना किया जाता है। दूसरों के सामने उन्हें जो नहीं देखने दिया जाता है वह बच्चे अकेले में देखकर अपने मन की संतुष्टि करते हैं और यहीं से शुरुआत होती है भटकाव की। इंटरनेट ही नहीं टी.वी. और फिल्मों में भी यही सबकुछ परोसा जाता है बस ढंग अलग-अलग होता है। |