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'ओ मेरे लाल आजा...' प्रत्येक माँ स्कूल गए अपने बच्चे का इंतजार करती हुई इन पंक्तियों को प्रतिदिन जरूर गुनगुनाती होगी। बच्चों की चिंता हर माँ-बाप को सताती है। बच्चा यदि स्कूल से घर लौटने में लेट हो जाए या किसी दोस्त के घर जाए... लेकिन जब तक वह घर नहीं लौटता है तब तक माँ-बाप की जान घबराती है। अपने लाल को सही सलामत घर पर पाकर ही उनकी जान में जान आती है।

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आए दिन बच्चों के साथ होती वारदातों को देखकर माँ-बाप भयभीत हो जाते हैं। अपने आसपास व टेलीविजन पर हत्या, अपहरण आदि की बढ़ती घटनाओं को देखकर उनके मन में भय घर कर जाता है और इसी भय के चलते वे अपने बच्चे को घरों में कैद कर देते हैं। एक ओर बच्चों के भविष्य का सवाल होता है तो दूसरी ओर बच्चों की सुरक्षा का।

भारत में हर साल बच्चों के अपहरण के हजारों मामले दर्ज होते हैं। देश में हर 23 मिनट में अपहरण का एक मामला सामने आता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2006 में अपहरण के 21,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए तथा वर्ष 2007 में यह आँकड़े पिछले आँकड़ों को भी पार कर गए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट तो और भी चौंका देने वाली है जिसके अनुसार भारत में हर साल 45,000 बच्चों का अपहरण होता है। अपहरण के सर्वाधिक मामले दिल्ली व उससे जुड़े इलाकों में अधिक सामने आते हैं। बहरहाल बच्चों की सुरक्षा आज माँ-बाप की एक बहुत बड़ी चिंता बन गई है।

नोएडा का अनंत गुप्ता अपहरण कांड हो या कोलकाता का शुभम अपहरण कांड, चंडीगढ़ का अभि वर्मा हो या कोटा का वैभव- सभी मामलों में फिरौती व अपहरण के ढंग को लेकर कई चौंका देने वाले तथ्य सामने आए। इन सभी मामलों मेअपहरणकर्ताओं का निशाना बने मासूम बच्चे। वे बच्चे जिन्हें तो यह भी नहीं पता कि अपहरण होता क्या है। उन्हें तो बस फिरौती के रूप में एक बड़ी रकम हासिल करने का माध्यम बनाया गया।
 
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