गायत्री शर्मा ' ' भीड़ में यूं ना छोड़ों मुझे घर लौट कर भी आ ना पाऊँ माँ भेज ना इतना दूर मुझको तू याद भी तुझको आ ना पाऊँ माँ ..'' घर-परिवार को खुशियों से भर देने वाला आपका लाड़ला आज गुमसुम क्यों है? कहाँ खो गई उसकी शरारतें , हँसी और चंचलता...आज वह क्यों खुद में खोया-खोया तन्हा अकेला बैठा हैं ? क्या हमने कभी इस बात को गंभीरता से लिया है? बच्चे स्वभाव से बड़े कोमल होते है। बगैर कुछ सोचे-समझे ही वे किसी अजनबी पर भरोसा कर लेते है परंतु कभी-कभी उनकी यह भूल उनके लिए जीवनभर की परेशानियों का न्यौता बन जाती है। आए दिन बच्चों के साथ होने वाली शोषण की घटनाएं इसी कड़वी हकीकत का पर्दाफाश करती है ।
शोषण एक चित-परिचित शब्द है कामकाजी लोगों के लिए,लेकिन शोषण और वो भी मासुम बच्चों के साथ,यह बात आसानी से हमारे गले नही उतरती। मानवता से पशुता की और यह कैसी छलांग है हमारी?
शोषण का सामान्य अर्थ शारीरिक व मानसिक किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से हो सकता है वैसे तो आज शोषण को रोकने के लिए दर्जनों कानून अस्तित्व में आए है परंतु हमेशा की तरह जागरूकता के अभाव में कानून की विफलता लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल उड़ाती नजर आ रही है।
आपका बच्चा आज कितना सुरक्षित है। इसके बारे में कुछ ना ही कहे तो बेहतर है। एक सर्वे के अनुसार भारत में 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण का शिकार है जो अपने आप में एक चौका देने वाला आँकड़ा है।
यौन शोषण के अधिकांश मामलों में से आधे से अधिक मामलों में अपराधी बच्चों के पारिवारिक सदस्य जैसे उसके मामा,काका,भाई आदि ही होते हैं । जो िरश्तेदारी का फायदा उठाकर भोले-भाले बच्चों को आसानी से बहकावे में फँसा लेते है।
यौन शोषण के अधिकांश अपराधी मानसिक रूप से विकृति,नपुंसकता या अकेलेपन से ग्रसित लोग होते है जो मासुम बच्चों के साथ अपनी इच्छापूर्ति करते है। यौन शोषण के कई मामले या तो बदनामी के कारण दर्ज ही नहीं करवाए जाते या फिर प्रांरभिक स्तर पर ही रफा-दफा कर दिए जाते हैं ।
अपने बच्चे को काला टिका लगाकर दुनिया की नजरों से बचाने वाली माँ तब अपनी ही बेबसी पर आँसू बहाती है जब कोई उसके जिगर के टुकड़े को पीडि़त कर उसे बेदर्दी से नोंचता है और डरा धमकाकर उसकी आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर देता है। क्या बीतती होगी उन माँ-बाप पर जिनके कलेजे के टुकड़े को हर दिन घुट-घुट कर जीना पड़ता है?
बच्चों के प्रति माँ-बाप की अनदेखी उन्हे बहुत भारी पड़ सकती है इसलिए समय रहते जाग जाए और यौन शोषण के प्रति आवाज उठाए। व्यस्तताएँ अपनी जगह है और जिम्मेदारियाँ अपनी जगह। अत: अपने बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़ने की बजाय स्वयं उन पर ध्यान दें । बच्चों से उनका बचपन न छीने। फूल से कोमल बचपन को मुरझाने ना दें ।
शोषण से कैसे बचे-
*बच्चों को अजनबियों के भरोसे न छोड़े।
*बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान दें ।
*दोस्त बनकर बच्चों की समस्याओं को सुने।
*अधिक से अधिक समय बच्चों के साथ बिताएँ ।
*बच्चों की गलतियों पर उसे प्यार से समझाएँ ।
*अश्लील साहित्य को बच्चों की पहुँच से दूर रखे ।
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