उमा 15 वर्ष के उमा के सुखी वैवाहिक जीवन में अचानक भूचाल आ गया। पति दूसरे शहर में नौकरी करते-करते नजदीकी रिश्तेदार से ही दिल लगा बैठे। सीधी-सरल उमा ने पहले तो पति को समझाने व उसके वापस आने का इंतजार किया, लेकिन कोई बात न बनी। अपने मन पर पत्थर रख सब चुनौतियों को पार कर उन्होंने कम्प्यूटर कोर्स किया व कम्प्यूटर पर ही टैली व टाइपिंग का काम कर अब गुजारा कर रही हैं। साथ ही दोनों बड़े होते बच्चों को उच्च शिक्षा देने का निरंतर प्रयास जारी है। इससे उनमें आत्मविश्वास जगा।
शमशाद बेगम शमशाद बेगम आज शिक्षा की अलख जगा रही हैं। वे 10 वर्ष पहले साक्षरता कार्यक्रम से जुड़ीं तो उनके समाज व गाँव में खूब विरोध हुआ, क्योंकि इस काम में काम में घूमना बहुत पड़ता था। लेकिन उन्होंने सबके तानों की कतई परवाह नहीं कीऔर अपनी यात्रा जारी रखी। गाँव में स्वसहायता समूह का गठन कर निरक्षर महिलाओं के साथ स्वरोजगार शुरू किया तो गाँव की महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदली। बस, फिर तो सबका उन पर विश्वास भी बढ़ा। उनके इस कार्य को शासन व अनेक संस्थाओं से पुरस्कार मिले। उनकाअसली ध्येय मजदूर महिलाओं को पढ़ाकर आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।
अनु महानगर निवासी अनु शादी कर छोटे-से शहर में आई तो उसकी कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में ही रह गई। पति डॉक्टर होने के कारण समय भी नहीं कटता था और छोटे कस्बे में अच्छी नौकरी की संभावना भी कम थी। कलाप्रेमी अनु शुरू से ही घर में सजाने में रुचि रखती थीं व उन्हें गार्डनिंग का शौक भी था। अनु ने बच्चों की देखभाल करते हुए अपने गार्डन में अनेक प्रयोग किए व बोनसाई बनाएँ। धीरे-धीरे उनके गार्डन की चर्चा होने लगी व कई पत्रिकाओं में भी इस बारे में छपा। आज उन्होंने बोनसाई बनाकर बेचना भी प्रारंभ कर दिया व एक नर्सरी भी घर में बनाई है, जहाँ कई प्रकार के सुंदर पौधे मिलते हैं। इससे उन्हें थोड़ी आर्थिक मदद भी होती है जिसे वे गरीब, बेसहारा लोगों पर खर्च करती हैं। अनु को इससे असीम संतोष मिलता है।
सीमित साधन व कड़े संघर्षों के अलावा स्वावलंबन की राह से गुजरते हुए इन साधारण-सी महिलाओं ने अपने आप अपनी राह चुनी और कई असाधारण काम कर दिखाए। उन्होंने परिवार के दायित्व को संभालते हुए अपने शौक व करियर को भी पूरा किया व असीम संतोष पाया। घर हो या बाहर ये प्रेरणापुंज बन जगमगा रही हैं।
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