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'साठ वर्ष की युवती' शोभा डे

अब देखिए ना, हिलेरी क्लिंटन और सोनिया गाँधी जैसी महिलाएँ भी तो हैं, जो 60 की उम्र पर आकर शिखर को ही छू रही हैं। मैं भी यह सोचती हूँ कि उम्र के साठवें को एक बढ़िया अवसर में तब्दील करूँ। बजाय समय की रेत पर फेंक दिए जाने के।'

शोभा ने इसी तर्ज पर एक आलेख भी बॉम्बे टाइम्स के लिए लिखा। इस आलेख को पढ़कर कई स्त्रियों की भावभीनी प्रतिक्रियाएँ उन्हें मिलीं। एक स्त्री ने कहा, 'पता नहीं उम्र बढ़ने पर हम अपनी बढ़ती उम्र को लेकर इतने क्षमा प्रार्थी क्यों हो जाते हैं, जैसे हमने कोई गलती कर दी हो!

हम अपने आपको अनुपयोगी और नाचीज मानने लगते हैं। यह गलत है। जैसे ही मुझे यह महसूस हुआ, मैंने अपनी बहू से कहा कि मैं अपने पसंदीदा हुनर की कोई क्लास ज्वॉइन करूँगी। मनचाहे परिधान पहनूँगी। मैं एक ओर क्यों बैठा दी जाऊँ? मेरा अपना जीवन है औरमैं उसे जिऊँगी।'

अपनी पाठिका की तरह शोभा भी ऐसी ही कुछ योजनाएँ बना रही हैं, आज के जमाने का 60 पहले का 40 है, वैसे भी सारा दारोमदार इस बात पर होता है कि महिलाएँ स्वयं के बारे में क्या सोचती हैं। मैं भी अब मनपसंद के परिधान पहनूँगी। यह एक मुक्त करने वाला एहसास है। मनोवैज्ञानिक तौर पर भी मुक्त करने वाला

मैंने अपने परिवार को भी कह दिया है कि मैं अचानक 'साल्सा डांस' सीखने की योजना बना लूँ तो आश्चर्य में न पड़ जाएँ। हो सकता है मैं फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स करना चाहूँ या ऐसा कोई काम करना चाहूँ, जो बचपन से करना चाहती थी। जो तब नहीं कर पाई वो भी अब करूँगी। इसका मतलब यह नहीं कि मैं स्वार्थी हो गई हूँ। मतलब यह कि मैंने अब यह अधिकार अर्जित कर लिया है कि मैं अपने मनपसंद काम तीसरी पारी में कर सकूँ, हर वक्त स्वीकृति की राह न देखूँ

अन्य महिलाओं को भी शोभा डे का सुझाव है कि वे अपना ध्येय साफ रखें, उम्र के आँकड़े को तवज्जो न दें तो बाकी सब होता जाएगा।
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