अपने गाँव के बिलकुल करीब के एक कस्बे सुनाबेड़ा में एक सड़क निर्माण योजना में काम करते समय शिक्षा की उसकी महत्वाकांक्षा को फिर से बल मिला। वहाँ हर रोज बच्चों को खुशी-खुशी स्कूल जाते देखकर उसका मन भी स्कूल जाने को करने लगा था। उसने फैसला कर लिया कि उसके पिता या उसका समाज जो चाहे कहे, वह अपनी पढ़ाई जारी रखेगी। उसने अपने पहले वाले बलादा आवासीय स्कूल में फिर से अपना नाम लिखवा लिया।
2006 में उसकी जिंदगी में एक निर्णायक मोड़ आया। यूनिसेफ ने उसे लड़कियों की शिक्षा के बारे में 'मुझे वहाँ से निकालो' के बेल्जियम अभियान में भारत की आदिवासी लड़कियों का प्रतिनिधि चुन लिया।
टुनी की खुशी का पारावार नहीं था। उसके पिता और गाँव वालों को उसकी सफलता के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। टुनी के पिता पदलाम ने कहा, 'मैंने अपनी जिंदगी में समुद्र ही नहीं देखा था जबकि मेरी बेटी सात समंदर पार करके एक 'फिरंग' देश में जाने की बात कह रही थी।'पिता को यह समझाने में कि यह एक बहुत बड़ा अवसर था, टुनी, सरकारी पदाधिकारियों और उसके स्कूल के शिक्षकों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। टुनी बताती है, 'मैं स्कूल से एक ग्लोब और एटलस लेकर आई और मैंने उन्हें समझाया कि हमारा गाँव कहाँ हैऔर बेल्जियम कहाँ है।'
वहाँ, उसने बुनियादी शिक्षा, सुविधाओं और सेवाओं से वंचित करोड़ों बच्चों की ओर से बड़े असरदार ढंग से अपने विचार व्यक्त किए। यूनिसेफ की सेसिलो अडोर्ना लिखती है,
'टुनी जैसे बच्चे एक बड़े मकसद के दूत हैं। समाज में समावेश को बढ़ावा देने के मामले में वे सबसे कारगर साधन होते हैं।
अब वह बेल्जियम से वापस आ गई है, लेकिन उसके इरादे बुलंद हैं। उसने दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की है और वह डॉक्टर बनने के अपने सपने के और करीब पहुँच गई है।
उड़ीसा के एक अग्रणी संस्थान, कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने उसे अपने जूनियर साइंस कॉलेज में दाखिला दे दिया है। वहाँ वह इंटरमीडिएट कोर्स करेगी।
टुनी को यूनिसेफ द्वारा जमीनी स्तर की खबरें देने की भी ट्रेनिंग दी गई है। उसने आदिवासी और ग्रामीण लोगों को वंचित रखने तथा उनके प्रति अन्याय के बारे में रिपोर्टें तैयार की हैं, जिनमें से कई उसने देश में और देश से बाहर प्रस्तुत की हैं। दूरदर्शन केंद्र ने भी उसे तथा उस जैसे बच्चों को सम्मानित किया है। इस प्रकार के सम्मान और समर्थन से टुनी तथा अन्य दूसरे बच्चों में आत्मविश्वास को बल मिल रहा है।'
टुनी अब कई आदिवासी बच्चों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। न केवल उसके पिता बल्कि गाँववालों को भी उस पर गर्व है। प्रसन्न पदलाम कहता है, 'मुझे अभी भी नहीं पता है कि टुनी कहाँ गई थी, यह बेल्जियम है कहाँ। लेकिन अब मुझे भरोसा है कि कुछ सालों में ही वह डॉक्टर बन जाएगी। अब मुझे लग रहा है कि उसकी शिक्षा का विरोध करना कितना गलत था।' उसे अब खुशी है कि उसकी बेटी ने उसे अपना नाम लिखना सिखा दिया है। टुनी बेहतर भविष्य के प्रति आश्वस्त है- अपने लिए और कोरापुट के आदिवासी बच्चों के लिए भी।
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