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खेलें इकोफ्रेंडली होली
- डॉ. अनिल दशोरे,
नेत्ररोग विशेषज्ञ
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इन दिनों होली में कृत्रिम रंगों का बहुतायत से उपयोग होता है। उससे न सिर्फ त्वचा खराब ही होती है बल्कि कई मौकों पर अपूरणीय क्षति भी हो जाती है। आँखों, कानों और मुँह में रंग जाना आम हो जाता है। कई उत्साही रेड और सिल्वर ऑक्साइड रंगों का उपयोग करते हैं लेकिन उससे बालों और त्वचा पर गहरा असर पड़ता है। कई मरीजों की त्वचा हमेशा के लिए काली पड़ जाती है जिसे ठीक करने में बहुत वक्त लग जाता है। त्योहार मनाते समय जोश में होश भी साथ रहना चाहिए अन्यथा रंग में भंग पड़ते देर नहीं लगती।

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है और त्योहारों का मतलब ही एक-दूसरे से मिलना-जुलना और उल्लास को बढ़ावा व प्रोत्साहित करना है, और होली उन्हीं में से एक है। होली एक ऐसा त्योहार है जो देश के हर भाग में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। होली केरंग हर व्यक्ति को तरह-तरह के रंग में रंग देते हैं परंतु आजकल प्रयोग में लाए जाने वाले रंगों से कभी-कभी लोगों को नुकसान उठाना पड़ता है। इन रंगों में प्रयुक्त केमिकल्स शरीर की त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं। होली के रंगों से अलग-अलग व्यक्तियों की त्वचा में अलग-अलग हानिकारक प्रभाव होते हैं।

* एलर्जिक कॉन्टेक्ट डर्मोटाइटिस- इसमें जो लोग संवेदनशील होते हैं उनको रंग लगने से त्वचा का सेन्सेटाइजेशन होकर लालपन आ जाता है और खुजली चलने लगती है। ऐसी रिएक्शन सभी की हो यह जरूरी नहीं है बल्कि उन्हीं को होती है, जिनकी त्वचा संवेदनशील होती है।

* तेज खुजली- रंगों में जो भारी रसायन जैसे कोलतार, एसिड इत्यादि होते हैं, ये त्वचा को जला देते हैं। इसकी रिएक्शन सभी को होती है।

बचा
* होली खेलने से पहले चेहरे पर सनस्क्रीम या माइश्चराइजर लगा लें। सनस्क्रीम/ माइश्चराइजर, होली के गहरे सूखे रंगों से त्वचा की रक्षा करते हैं।
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