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- रिनी चेट्टी

कांजीवरम साड़ी
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सा़ड़ी पारंपरिक भारतीय परिधानों में सबसे ज्यादा आकर्षक है। यही नहीं सलीके से पहनी गई साड़ी किसी भी महिला के सौंदर्य को दुगुना कर देती है। यह अलग बात है कि आजकल भागदौड़ भरी जिंदगी में स्त्रियाँ आरामदायक परिधान ही पहनती हैं। फिर भी जब बात उत्सवों, त्योहारों या पारंपरिक भव्य आयोजनों की आती है, तो साड़ी ही महिलाओं की पहली पसंद होती है। फिर चाहे वो कोई पुरस्कार ग्रहण करती अभिनेत्री हो या फिर घर की शादी में रस्में निभाती कोई आम युवती।

आमतौर पर यदि पूछा जाए कि दक्षिण की महिलाओं की पहचान क्या है तो उत्तर होगा लंबे, घने और काले बालों, उस पर सजी खूबसूरत वेणी और तीखे-नाक-नक्श... और... और... जी हाँ... कांजीवरम की खूबसूरत तथा भारी-भरकम साड़ियाँ। शायद इतना पढ़कर आपको बॉलीवुड सुंदरी रेखा, जयाप्रदा, वैजयंती माला आदि भी याद आ जाएँ।

इनमें से रेखा तो न केवल कांजीवरम पहनने के मामले में, बल्कि अपनी साड़ियाँ खुद डिजाइन करने और दूसरों को इस बारे में टिप्स देने के लिए भी जानी जाती हैं। खैर... तो चलिए आज इन्हीं कांजीवरम साड़ियों के बारे में करीब से जानते हैं। कांजीवरम की बुनाई का यह पारंपरिक तरीका कांचीपुरम से चलकर मद्रास या अब चेन्नई तक आया। इसे मुख्यतः शादियों या समारोहों में पहने जाने वाले परिधान के रूप में ग्रहण किया गया।

विशेषकर दक्षिण भारतीय परिवारों में शादी या बड़े समारोहों में कांजीवरम पहनने का चलन आज भी उतने चाव से निभाया जा रहा है। कांजीवरम साड़ियों की मुख्य डिजाइन में विशेषतः बॉर्डर और पल्ले पर खास काम किया जाता रहा है। बीच की पूरी साड़ी या तो खाली रखी जाती थी या फिर इसमें बूटियाँ बुनी जाती थीं। एक पतली जरी बॉर्डर तथा कुछ बूटियों वाली कांजीवरम साड़ी की कीमत लगभग 6 हजार रुपए से शुरू हो सकती है।

आजकल डिजाइनरों ने कांजीवरम की पारंपरिक डिजाइनों के साथ नए प्रयोग किए हैं। जिनमें मुख्यतौर पर वजन में कुछ हल्की साड़ियाँ भी बनाई गई हैं। इसके लिए इस बुनाई में जॉर्जेट,मलमल, रेशम तथा चंदेरी का मिश्रण किया गया है। इनमें कांजीवरम में सुनहरी जरी के रेशों तथा परंपरागत फूल तथा मंदिरों की डिजाइनों के साथ ही नए ग्राफिकल तथा ज्यॉमेट्रिकल डिजाइनों, एम्ब्रायडरी तथा सेल्फ प्रिंट एवं नए रंगों को भी जोड़ा गया है।

इनसे आज की कॉकटेल तथा कार्पोरेट साड़ियाँ भी बनाई जा रही हैं। ऐसी एक साड़ी बुनने में लगभग 20-25 दिन लगते हैं। यही नहीं समय की माँग को देखते हुए इस बुनाई से साड़ियों के अलावा स्कर्ट, कुर्ते, टॉप तथा मिडी भी बनाए जा रहे हैं, जिन्हें विदेशों में भी पसंद किया जा रहा है।

पिछले दिनों इस खूबसूरत कारीगरी ने इंडियन फैशन वीक में पहली बार आकर रैम्प पर भी लोगों को मोह लिया। दरअसल कांजीवरम एक ऐसा परिधान है जो आपको किसी गहने के पहनने का सा सुख देती है। भारी-भरकम जरी से बनी यह सुंदर कारीगरी देखते ही मन मोह लेती है। आज भी कांजीवरम का क्रेज महिलाओं में गहने खरीदने जितना ही है। इसलिए आपका वॉर्डरोब एक कांजीवरम के बिना अधूरा है।

फर्क असली-नकली का :
कांजीवरम साड़ियाँ एक अनूठी तथा पारंपरिक कारीगरी हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा के चलते इन्हें भी बाजार में नकली साड़ियों से जूझना पड़ रहा है। जो लोग असली कांजीवरम के मुरीद हैं वे भी कई बार असली-नकली में धोखा खा जाते हैं। आइए जानें कुछ सामान्य बिंदु जो असली-नकली को पहचानने में मदद करें।

असली कांजीवरम की सबसे बड़ी खासियत होगी उसकी ज़री। यह ज़री न केवल बहुत स्पष्ट, चमकीली तथा भारी होगी बल्कि यह बुनाई में घुली-मिली ही मालूम होगी। असली कांजीवरम को हमेशा असली सोने की जरी के साथ ही बुना जाता है।

एक असली कांजीवरम का वजन कम से कम 500 ग्राम होगा।

असली कांजीवरम दिनभर पहने रहने पर भी मुसती (सिकुड़ती) नहीं। इसकी विशेषता है कि इसे आप साधारण पानी से भी इसे धो सकते हैं।

असली कांजीवरम के रंग और बुनाई तथा वजन हमेशा नकली से अच्छे तथा रिच रहेंगे।
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