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आज की वामा के बदलते परिधान  Search similar articles
पूजा कैन
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भारतीय महिलाओं के पहनावे पर समय का असर हमेशा दिखा है। हालाँकि हर सदी के बदलाव के बावजूद साड़ी एक मानक पैमाना मान लिया गया था। धीरे-धीरे ही सही पर शहरों और कस्बों की चहारदीवारी से बाहर जाने वाली महिलाओं ने इसके विकल्प के तौर पर सलवार-सूट को प्राथमिकता दी और अब भाग-दौड़ भरी जिंदगी में यही महिलाएँ जींस, ट्राउजर, कुर्ते आदि भी बेहिचक इस्तेमाल करने लगी हैं।

दरअसल आज की मल्टी टास्किंग छवि वाली महिला ऐसा पहनावा पसंद कर रही है, जो रोजमर्रा के उनके कामों में बाधा बनने की बजाय उन्हें कंफर्ट में रखे। लिहाजा, महानगरों में अब युवतियों व महिलाओं ने दुपट्टे को भी बाय-बाय कर दिया है।

  भारतीय पुरुषों ने तो देश में औद्योगिकरण की शुरुआत के साथ दशकों पहले ही धोती-कुर्ता, टोपी छोड़ पेंट और शर्ट तथा अधिक जरूरत पड़ने पर कोट, टाई का भी पहनावा अपना लिया था, लेकिन महिलाओं के लिए       
वे ऐसे ढीले कुर्ते और सलवारपहनना पसंद कर रही हैं, जिसमें उन्हें दुपट्टे के उड़ते-चलते वाहन में फँसने आदि की कशमकश से न गुजरना पड़े।

भारतीय पुरुषों ने तो देश में औद्योगिकरण की शुरुआत के साथ दशकों पहले ही धोती-कुर्ता, टोपी छोड़ पेंट और शर्ट तथा अधिक जरूरत पड़ने पर कोट, टाई का भी पहनावा अपना लिया था, लेकिन महिलाओं के लिए ऐसे किसी बदलाव की गुंजाइश नहीं थी।

फिर समय के साथ जब महिलाएँ घर से बाहर निकलीं तो उन्होंने पहनावे को काम के हिसाब से ढाला। इसका ही नतीजा है कि आज शहरों से लेकर छोटे गाँव या कस्बों तक में महिलाएँ या युवतियाँ सलवार-सूट के अलावा जींस तक में नजर आ जाएँगी। इस तरह के पहनावे को अब 'बेहयाई' नहीं माना जाता।
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