| | हम देहाती है पर गँवार नहीं | | | ऐ देहाती, रुक! | | | | | | | | |
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| - निकिता अमीन जब कोई गाँव का लड़का या लड़की पढ़ने या काम की तलाश में शहर आते हैं तो उनका स्वागत ऐसे ही ताने करते हैं। विरले ही होंगे जिन्हें ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। सुबह-सुबह कॉलेज के गेट पर पहुँचते ही रमेश कड़कती आवाज में चिल्लाया- ऐ देहाती, रुक! रमेश के दोस्त ने पूछा कि क्या देहाती भी किसी का नाम है। इस पर रमेश लापरवाही से बोला- नहीं यार, गाँव से आया है न, इसीलिए उसको सब देहाती कहकर पुकारते हैं। शहरों में ऐसे दृश्य आम हैं। जब कोई गाँव का लड़का या लड़की पढ़ने या काम की तलाश में शहर आते हैं तो उनका स्वागत ऐसे ही ताने करते हैं। विरले ही होंगे जिन्हें ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। यदि उनका कोई जान-पहचान वाला शहर में रहता है तब तो बात संभल जाती है, लेकिन ग्रामीण छात्र-छात्राएँ स्वयं अपने आपको इस नए परिवेश के अनुरूप ढालने का प्रयत्न करते हैं तो इसमें वक्त तो लगता है। | | शहरी युवा अपने साथी को चिढ़ाने के लिए "देहाती", "गँवार" आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। शहरों के मुहानों पर बसे गाँवों या राजमार्गों के किनारे बसे गाँवों से आए छात्रों की स्थिति थोड़ी बेहतर होती है, क्योंकि उन्हें शहरी जीवन की जानकारी रहती है। |
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कई दफे तो वे अकेलेपन के भी शिकार हो जाते हैं, क्योंकि वे शहरी माहौल से सर्वथा अलग माहौल से आए होते हैं। उनका पहनावा भी उनकी परेशानी का सबब बन जाता है। जो लड़कियाँ गाँव से आती हैं उनके कपड़े शहरी लड़कियों की तुलना में बहुत ओल्ड फैशन्ड होते हैं। उन्हें बालों में तेल लगाने की आदत होती है। सरल स्वभाव और अज्ञानता के कारण वे परेशान हो जाती हैं। यही सब उन्हें साथी लड़कियों के बीच उपहास का पात्र बनाता है। उन तथाकथित आधुनिक बालाओं को भी यह सब करने में आनंद आता है। यही हाल लड़कों का भी होता है। शहरी युवा अपने साथी को चिढ़ाने के लिए "देहाती", "गँवार" आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। शहरों के मुहानों पर बसे गाँवों या राजमार्गों के किनारे बसे गाँवों से आए छात्रों की स्थिति थोड़ी बेहतर होती है, क्योंकि उन्हें शहरी जीवन की जानकारी रहती है। पर इंटीरियर में बसे ग्रामीण इलाके तो हमेशा से ही उपेक्षा के शिकार रहे हैं। ऐसे गाँवों से आने वाले शहरिया लोगों के निशाने पर रहते हैं। बात-बात में यह ताना कि गाँव से आया है क्या। यह स्थिति केवल कॉलेजों तक ही सीमित नहीं है। कामकाजी संस्थानों, हॉस्टलों आदि में भी कमोबेश यही हालत है।तो क्या करें जब ऐसे हालात में फँस जाएँ। पेश हैं कुछ ऐसे टिप्स, जो ग्रामीण युवाओं की परेशानी कुछ हद तक कम कर सकती है-1. जब शहर में रहने आएँ तो अकेले न रहें।2. सहपाठियों को जानने के लिए थोड़ा वक्त दें।3. किसी पर भी जल्दी भरोसा न करें।4. आपके कपड़े महँगे न हों पर साफ हों, इस बात का खयाल रखें।5. किसी की कॉपी न करें, क्योंकि आप जैसे भी हैं वैसे अपनी मौलिकता में अच्छे लगेंगे।6. अपना लक्ष्य निश्चित करके काम करें और बड़े लक्ष्यों को भी छोटे भागों में बाँटें। 7. अपने माता-पिता के सपनों को हमेशा याद रखें। 8. तानों से उद्वेलित न हों, इसे सकारात्मक रूप में लेकर अपनी कमियों को दूर करें।9. जबरन किसी से विवाद से बचें।10. कामकाजी लोगों को अपने काम से जवाब देना चाहिए।11. ज्यादा समय अकेले न बिताएँ। इससे डिप्रेशन हो सकता है।12. जब टेंशन हो तो संगीत का सहारा लें।13. अपने को हीन न समझें। यह बात समझ लें कि भारत का आधार गाँव हैं।14. बात ज्यादा बिगड़ जाए तो उचित कदम उठाएँ। |
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