| | कामकाजी माँ और समझदार बच्चे | | | | | | | | | | | |
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| - विनीता तिवारी कामकाजी महिलाओं पर दो तरफा जिम्मेदारी रहती है। खासतौर पर बच्चों के मामले में। अगर उन्हें दफ्तर में भी बच्चों की चिंता सताती है तो बच्चे भी उनकी दूरी को दिल से महसूस करते हैं। आज बदलते समय तथा माहौल को देखते हुए हालाँकि बच्चे पहले से ज्यादा परिपक्व होने लगे हैं तथा सामंजस्य भी बैठाने लगे हैं। गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चल सके, बच्चे आर्थिक तंगी महसूस किए बिना ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकें, इस कारण से भी महिलाएँ घर से बाहर कदम रखती हैं। लेकिन इसके साथ ही एक अपराधबोध भी उन्हें कचोटता रहता है कि कहीं वे अपने बच्चों को सारा दिन घर पर अकेला छोड़कर उनके साथ अन्याय तो नहीं कर रही हैं? उनके भविष्य को सँवारने के सपने देखते-देखते कहीं उनसे दूर तो नहीं होती जा रही हैं। इन सब प्रश्नों का कामकाजी माँ के मन में उठना स्वाभाविक भी है, क्योंकि बच्चे जितने माँ से जुड़े होते हैं उतने पिता से नहीं। अक्सर बच्चे पिता का ऑफिस जाना तो पसंद करते हैं पर माँ का नहीं। इस बात पर बच्चे कुछ इस तरह की प्रतिक्रियाएँ देते हैं। चार वर्षीय प्रीति की मम्मी किसी प्रायवेट ऑफिस में कार्य करती हैं। प्रीति कहती है- "अच्छा हो कि मम्मी कभी ऑफिस नहीं जाए।" अगर उससे कहा जाए कि-मम्मी ऑफिस जाती है तभी तो टॉफी लाती है तो वह कहती है-"मुझे टॉफी नहीं चाहिए।" वहीं 8 वर्षीय पवन कहता है-"अच्छा है मम्मी ऑफिस जाती है। मम्मी घर पर होती है तो टीवी नहीं देखने देती, खेलने नहीं देती, बस दिनभर पढ़ो-पढ़ो। उनकी थोड़ी बहुत याद आती है जब कुछ खाने का मन करता है। वैसे मैंने सेंडविच और मेगी बनाना सीख लिया है।" कई बच्चे माँ के कामकाजी होने को उम्र के साथ समझने भी लगते हैं। 10 वर्षीय शरारती, पर समझदार नुपुर कहती हैं "मेरी मम्मी घर बहुत अच्छे से संभालती है। उतना ही अच्छे से ऑफिस का काम भी देखती है पर उसके साथ ही मेरी मम्मी लेखिका भी है। जब उनका आलेख प्रकाशित होता है और टीचर क्लास में यह बात कहती हैं तो बहुत अच्छा लगता है। उनकी मुझसे भी अपेक्षा बढ़ जाती है। इसीलिए मैं अच्छा पढ़कर हमेशा फर्स्ट आती हूँ। 10 साल की राखी से जब यही सवाल पूछा जाए तो वह कहती है- "मुझे मम्मी का ऑफिस जाना पसंद भी है और नहीं भी। कभी जब हमारी छुट्टी होती है। मम्मी तैयार होकर हमें अकेला छोड़कर ऑफिस चली जाती है, तब हम बहुत बोर होते हैं, पर मैं यह भी अब सोचने लगी हूँ कि मम्मी ऑफिस नहीं जाती तो हम इतने अच्छे स्कूलों में कैसे पढ़ते? मुझे मेरी मम्मी बहुत अच्छी लगती है। थककर आती है फिर भी जो हम चाहते हैं वह खाना बनाती है और होमवर्क में भी मदद करती हैं।" 9 वीं कक्षा में पढ़ने वाले अन्वित की मम्मी एक बैंक में मैनेजर हैं। अन्वित कहता है-"मम्मी के कारण ही हम सेल्फ-डिपेन्डेट" बने हैं। अब मुझे छोटी-छोटी जरूरतों के लिए मम्मी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। हाँ, मुझे नौकरों के हाथ का खाना पसंद नहीं है, लेकिन जब मम्मी की छुट्टी होती है तब तो हर तरह के खाने की फरमाइश पूरी करती हैं। उनकी प्रेरणा के कारण ही मैं विद्यालय का सर्वश्रेष्ठ छात्र हूँ।" " मम्मी घर पर रहती है तो दिनभर डाँटती है, ऑफिस जाती है तो आराम रहता है। बोर होने का तो समय ही नहीं है। 2 बजे स्कूल से लौटता हूँ, खाना खाता हूँ, होमवर्क करता हूँ और मम्मी के आने का समय यानी डाँट खाने का समय होता" कहता है ऋषभ।अच्छा या बुरा लगने के अलावा परिपक्व होते बच्चों में शायद यह समझ भी आने लगती है कि माँ का काम पर जाना क्यों जरूरी है। लिहाजा वे सामंजस्य बैठाने में सक्षम होने लगते हैं। 3 वर्षीय नीति अपनी मम्मी का नौकरी करना पसंद करती है, वह कहती है-"हमें ढेर-सी सुविधा मिली है मम्मी-पापा दोनों के नौकरी करने के कारण। खास परेशानी कभी नहीं होती, पर दोपहर का खाना खुद गरम करना पड़ता है। मुझे अकेले रहने की आदत होनी चाहिए। यह क्या कि दिनभर मम्मी से चिपके रहो। पिछले वर्ष हमारी वार्षिक परीक्षा थी। मम्मी-पापा दोनों को किसी काम से बाहर जाना था, तब हम दोनों बहनों ने अकेले ही पढ़ाई की और परीक्षा ही नहीं दी बल्कि अपनी-अपनी कक्षा में प्रथम भी आए। वहीं बीई फर्स्ट ईयर की रति को मम्मी का घर में रहना ज्यादा पसंद है। उसके अनुसार- "मुझे मम्मी के आगे-पीछे घूमना बहुत अच्छा लगता है। मुझे बहुत खराब लगता है दोपहर का खाना खुद गर्म करके खाना। मैं मम्मी का सब काम करने के लिए तैयार हूँ, पर खाना मेरा मम्मी ही सर्व करे ये चाहती हूँ। यदि कोई भी आकर दोपहर में कॉलबेल बजा देता है तो मैं असुरक्षित महसूस करती हूँ। 17 वर्षीय सपना कहती हैं- "मेरी मम्मी बुटिक चलाती है। जब कभी मैं वहाँ जाती हूँ तो देखती हूँ कि मम्मी कितने धैर्य और आत्मविश्वास से लोगों से बात करती है। उनकी इस कुशलता पर मैं वाकई मुग्ध हूँ। मेरी मम्मी की घर-बाहर की सफलता तथा बदलते फैशन के उनके नॉलेज को अपडेट देखकर लगता है मैं भी इसी तरह का व्यवसाय चुनूँगी। मम्मी ने मुझे आत्मविश्वास से भरपूर बनाया है। घर-बाहर के काम बेहिचक पूरे कर लेती हूँ। मेरी मम्मी मेरा आदर्श है।" असल में माँ की जगह दुनिया में कोई नहीं ले सकता। बच्चे माँ के साथ खुद को सहज और सुरक्षित महसूस करते हैं। बदलते समय के साथ कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत भी बढ़ रहा है। यह काफी हद तक एक अनिवार्यता भी है और कुछ समय बाद बच्चे भी इसे समझने लगते हैं। |
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