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विवाह का अर्थ दो व्यक्तियों का मिलन होता है। अलग-अलग धर्मों में इसकी रस्में और कसमें भले ही अलग-अलग हों परंतु इसका मूल उद्देश्य जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाना ही होता है।

भारत विविधताओं वाला देश है। यहाँ अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। शादी में सबके रस्मो-रिवाज भी अलग-अलग होते हैं। ये रस्मो-रिवाज विवाह में अपना एक अलग महत्व रखते हैं।

* रस्म बिना शादी अधूरी :-
रस्में हैं तो कसमें हैं। इसी प्रकार शादी के दौरान होने वाली रस्मों के बगैर शादी का कोई मजा नहीं रहता है। रस्में एक ओर जहाँ हँसी-ठिठौली का माध्यम बनती हैं, वहीं दूसरी ओर दिलों को जोड़ने का सूत्र। रस्में रिश्तों को प्रगाढ़ बनाती हैं।

शादी पारिवारिक व सामाजिक समारोह है। इसमें हमारी खुशियों में शरीक होने के साथ हमारे सभी सगे-संबंधी इकट्ठा होते हैं, ऐसे में हँसी-ठिठौली का मजा ही कुछ और होता है और जब हँसी-ठिठौली जीजा-साली और समधी-समधन के बीच हो तो इसका अंदाज ही अलग हो जाता है।

* हर समाज में रस्में अलग-अलग :-
हर समाज में विवाह के तरीके व रस्मो-रिवाज में थोड़ा-बहुत अंतर होता है। जहाँ हिंदू वर-वधू अग्नि के सात फेरे लेते हैं, वहीं ईसाई ईसा मसीह के सामने एक-दूजे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकारते हैं। इस प्रकार सभी धर्मों में विवाह के तरीके अलग-अलग होते हैं।

विवाह की ये रस्में रोचक होने के साथ-साथ हास्यास्पद भी होती हैं। रस्म को निभाते हुए जहाँ गुजरा‍तियों में सासु माँ अपने तोरण मारते दामाद की नाक पकड़ती है वहीं माहेश्वरी परिवारों में वधू पक्ष की महिलाएँ वर के पिता को साड़ी व सोलह श्रंगार की सामग्री उपहारस्वरूप देती हैं।

रस्म अदायगी करते हुए मराठी समाज में साला अपने जीजा के कान पकड़ता है तो सिखों में भाभियाँ घड़े के पानी से देवर को नहलाती हैं।
* नेग का हक बनता है :-
शादी में छोटों को नेग का हक बनता है। खासकर जब जीजा के जूते छिपाए जाते हैं या ननद द्वारा अपने भैया-भाभी को द्वार पर रोका (डेली रोकना) जाता है तब उन्हें नेग का हक बनता है।

नेग (नकदी रुपए) लेने का मौका सबसे ज्यादा वधू पक्ष को मिलता है। यही तो वह मौका होता है जब साली अपने जीजा से छेड़खानी करती है और हक से नेग लेती है। इन रस्मों के लिए विवाह के पहले ही पूरी प्लानिंग कर ली जाती है ताकि इनाम वधू पक्ष के ही पाले में आए।

विवाह को यादगार बनाने में रस्मों की अहम भूमिका होती है। इस वक्त रस्मों के बहाने छेड़छाड़ भी हो जाती है और मौज-मस्ती भी। आखिर कोई बुरा क्यों मानेगा क्योंकि शादी में रस्मों के बहाने हँसी-ठिठौली करने का हक बनता है।
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