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सज-धजकर लड़के-लड़कियाँ गरबा मंडपों में जाते हैं। हर किसी के कपड़े दूसरों से अलग। अजीबो गरीब वस्त्रों में मांसल सौंदर्य का प्रदर्शन करती युवतियों को देखकर लगता नहीं कि वे गरबे के लिए यहाँ आई हैं। इन सभी युवाओं को देखकर तो यही लगता है कि यहाँ गरबा नहीं बल्कि फैशन परेड होती है।

* डांडिये का बहाना :-
आजकल गरबों में खुले तौर पर छेड़खानी व मारपीट की वारदातें होती हैं। स्वच्छंद युवा गरबों के बहाने अपनी मौज-मस्ती का नया साथी तलाशने यहाँ आते हैं। कोई भी किसी के भी साथ चाहे गरबा खेले, कोई रोक-टोक, कोई बंदिश नहीं।

डांडिये के बहाने सांझ ढ़ले घर से निकलना और अलसुबह घर लौटना। नौ दिन तक यही दिनचर्या रहती है युवाओं की।

इन नौ दिनों के रात के अँधेरे में कई पुराने रिश्ते टूटकर नए रिश्ते व नए दोस्त बन जाते हैं। घरवालों को भी भीड़भाड़ पता नहीं चलता कि हमारा बच्चा कहाँ है।

गरबे के नाम पर युवाओं को दी जाने वाली आजादी के दुष्परिणाम नवरात्रि में बढ़ती छेड़छाड़ व बलात्कार की वारदातों के रूप में सामने आ रहे हैं।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि अकेले गुजरात में नवरात्रि में अचानक कंडोम व गर्भनिरोधक दवाओं की खपत का बढ़ना इस धार्मिक त्योहार की आड़ में होने वाली अय्याशियों का एक कड़वा सच उजागर कर रहा है।

* त्योहार की गरिमा को रखे बरकरार :-
नवरात्रि उल्लास व उत्साह का त्योहार है। इसमें होने वाले गरबे हमारी पुरानी परंपरा के प्रतीक हैं। जिसका आयोजन हमारे लिए बेहद खुशी की बात है। लेकिन आजकल गरबों के नाम पर प्रतिस्पर्धा व फिजूलखर्ची का जो गोरखधंधा चल रहा है। वह बंद होना चाहिए। गरबे होना चाहिए पर निर्धारित समय में।

यह आयोजन ऐसे होना चाहिए। जिसका लुत्फ हर आम व्यक्ति उठा सके। इसे पूँजीपतियों का त्योहार बनाना व व्यवसायीकरण आम व्यक्ति को इस आयोजन से दूर धकेलता है। क्यों न धर्म-जाति के बंधन को भूलकर हम सभी इस त्योहार का आनंद उठाएँ।
 
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