राजस्थान की कल्पना मीणा, संजय बैरवा, माया गुर्जर, कालीबाई आदि अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जो समाज में फैली सामाजिक कुरीति बहुविवाह की प्रथा व नाते की प्रथा को जाहिर कर रहे हैं। | | भारत में कई जातियाँ व जनजातियाँ ऐसी हैं, जो आज भी पिछड़ेपन की गिरफ्त में है। आज भी कई रूढि़वादी रीति-रिवाज इन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने में अवरोध बन रहे हैं। |
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चौंकाने वाली बात तो यह है कि सरकार इस प्रथा की लगातार अनदेखी कर रही है। इससे पवित्र रिश्तों की मिठास मुनाफे के कारोबार की भेंट चढ़ गई है। नाते के रूप में मोटी रकम वसूलना तथा रूढि़गत रीति-रिवाजों के नाम पर औरतों की खरीद-फरोख्त करना अब इनके लिए एक खेल सा बन गया है। रिश्तों की अहमियत को ताक में रखकर जिंदगियों का सौदा करने की रूढि़वादिता इन लोगों को आज तक पिछड़ेपन के अंधकार से उबार नहीं पाई है। आज भी ग्रामीण राजस्थान में बाल विवाह, बहू विवाह आदि सामाजिक कुरीतियाँ प्रचलित है। जो इन लोगों को अब तक प्रगति से अछूता बना रही हैं। विकास की राह में रोड़ा बनते इन लोगों की सोच आखिरकार कब बदलेगी और कब ये समाज की प्रगतिशील पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे? सरकार की जनकल्याणकारी नीतियाँ कब कागजों से निकलकर हकीकत का चोला पहनेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। |