मुख पृष्ठ > विविध > वामा > आलेख > कोख का मोल, ममता अनमोल
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
कोख का मोल, ममता अनमोल
किराए की कोख कितनी महँगी?
NDND
नि:संतान दंपतियों के लिए संतानप्राप्ति के दो तरीके हैं। इनमें से एक परखनली शिशु तो दूसरा किराये की कोख है। दूसरे तरीके में कोई अन्य महिला नि:संतान दंपत्ति का भ्रूण अपने गर्भ में रखकर उनके शिशु को जन्म देती है।

जहाँ एक ओर 'किराए की कोख' की तकनीक बाँझपन का अभिशाप झेल रही महिलाओं के लिए एक सुखद संदेश लाई है वहीं इसने सामाजिक रिश्तों के संबंध में भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो अब तक अनुत्तरित हैं।

* मनमाने रुपयों की वसूली :-
बाँझपन के अभिशाप से मु‍‍‍क्ति पाने के लिए 'किराए की कोख' तो मिल जाती है मगर उस कोख का किराया इतना अधिक व मनमाना रहता है कि इस सुविधा का लाभ केवल धनाढ्य वर्ग के लोग ही उठा पाते हैं।

  'किराए की कोख' से संबंधित विधेयक के पारित होने के पश्चात ही कई ऐसे मामले सामने आए जिसमें सरोगेट मदर (किराए की माँ) का अपने गर्भ में पल रहे बच्चे से भावनात्मक लगाव हो गया तथा वह उसे उसके वास्तविक माता-पिता को लौटाने को राजी नहीं हुई।      
आम नि:संतान दंपति तो इसके लाभ से वंचित रहकर अंततोगत्वा नि:संतान होने का सामाजिक दंश झेलते-झेलते इस कदर टूट जाते हैं कि उसकी परिणति परिवार के बिखराव या फिर अप्रत्याशित घटनाओं के रूप में सामने आती है।

भारत में आजकल 'किराए की कोख' भी व्यवसायीकरण की आँधी से अछूती नहीं रही है। यहाँ किराए की कोख का शुल्क 10 लाख रुपए तक हो सकता है।

*क्या कहता है कानून? :-
'किराये की कोख' को विधि द्वारा भी मान्यता प्रदान की गई है। इसके लिए बनाए गए विधेयक में कुछ प्रस्ताव भी पारित हुए हैं जो आज तक विवादास्पद हैं। इन प्रस्तावों के अनुसार-
* शुक्राणु केवल शुक्राणु बैंक से और अंडाणु केवल पत्नी के परिवार से लिए जा सकेंगे।
* समलैंगी, किन्नर तथा अकेली औरत भी किराए पर कोख ले सकती है।
* स्वयंसेवी संगठन इन पर निगरानी रखेंगे।
* किराए की कोख के लिए विज्ञापन भी दिया जा सकता है।

* भावनात्मक लगाव :-
माँ और बच्चे का रिश्ता आत्मीयता का रिश्ता होता है क्योंकि जो माँ नौ माह तक अपनी कोख में जिस शिशु को आश्रय देती है, उस शिशु से भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है फिर चाहे वह सरोगेट मदर (किराए की माँ) ही क्यों न हो?

'किराए की कोख' से संबंधित विधेयक के पारित होने के पश्चात ही कई ऐसे मामले सामने आए जिसमें सरोगेट मदर (किराए की माँ) का अपने गर्भ में पल रहे बच्चे से भावनात्मक लगाव हो गया तथा वह उसे उसके वास्तविक माता-पिता को लौटाकर अपना वादा पूरा करने को राजी नहीं हुई।

ऐसी स्थिति में यह विधेयक, एक तरफ कानून और दूसरी तरफ आत्मीयता के रिश्ते के कारण सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है।
<< 1 | 2 
और भी
समलैंगिक संबंध: दो तर्क-दो विचार
रखें तालमेल घर और बाहर
घर की शोभा गृहलक्ष्मी
कवि की कल्पना नारी
कामयाब पत्नी से खुश हैं पति !
मुड़-मुड़ के ना देख...