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कोख का मोल, ममता अनमोल
किराए की कोख कितनी महँगी?
गायत्री शर्मा
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कहते हैं ममता का कोई मोल नहीं होता है। इस प्रकृति ने जहाँ औरत को बहुत सारी नैमतों से नवाजा है, वहीं उसकी झोली में ममता डालकर उसे परिपूर्णता भी प्रदान की है।

जो औरत नौ माह तक दु:ख-तकलीफें सहकर किसी भ्रूण को अपने गर्भ में पालती है, उससे उसका आत्मीय लगाव होना सहज ही है। वहीं दूसरी ओर वे औरतें जिनकी गोद विवाह के सालों बाद तक सूनी ही रहती है, अपनी ममता को आँसुओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर वे दिन-रात अपनी गोद में नन्हें शिशु की अठखेलियाँ देखने के सपने सँजोती रहती हैं।

  जहाँ एक ओर 'किराए की कोख' की तकनीक बाँझपन का अभिशाप झेल रही महिलाओं के लिए एक सुखद संदेश लाई है वहीं इसने सामाजिक रिश्तों के संबंध में भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो अब तक अनुत्तरित हैं।      
संतानहीनता की ‍‍विकट परिस्थिति में 'किराये की कोख' का कानून उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बनकर के आया है जिनकी गोद अब तक सूनी थी।

वहीं दूसरी ओर कानून ने महिला की कोख को 'किराए की कोख' और उसकी ममता को एक 'औपचारिकता' बनाकर रख दिया है जिसने अपने पीछे कई सवालों को जन्म दिया है।

आज भी इस देश के कई परिवारों में 'बाँझपन' की उलाहना सहते-सहते असंख्य महिलाएँ आत्महत्याएँ कर लेती हैं या फिर उनके पति अपने वंशज की प्राप्ति हेतु दूसरा विवाह कर लेते हैं।

इस कारण सामाजिक रिश्तों में दरार व असंतोष पनपता है, परंतु आज विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि अब कुछ भी असंभव नहीं रहा है। इनमें से विज्ञान का एक नया प्रयोग किराए की कोख का है, जिसके कारण आज अनेक बाँझ औरतों की सूनी गोद नन्हे-मु्न्नों से भर गई है।

'बाँझपन' का इलाज आज विज्ञान द्वारा चिकित्सा के क्षेत्र में की गई नई तकनीकों की खोज से सहज बन पाया है। तकनीकों के कंधों पर पैर रखकर अब हमने सामाजिक और नैतिक समस्याओं का हल खोज निकाला है।

कहने-सुनने में यह भले ही असहज लगे परंतु यह विज्ञान ही है जिसने किराए की कोख अथवा 'टेस्ट ट्यूब बेबी' के रूप में ‍निसंतान दंपतियों को एक नया विकल्प दिया है। हालाँकि ये दोनों ही इलाज बहुत महँगे हैं लेकिन संतान की चाह रखने वालों के लिए ये बेहतर विकल्प भी है। इससे कई परिवार बिखरने से बचे है।
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