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समलैंगिक संबंध: दो तर्क-दो विचार
आखिर यह लुका-छिपी कब तक?
गायत्री शर्मा
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प्रकृति ने जहाँ मनुष्य को देह दी है तो संबंध बनाने की आजादी भी। पुरुष एवं स्त्री के कुछ संबंधों को कानून ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है तो कुछ संबंधों को अस्वीकृत करते हुए अनैतिक करार दिया है। ऐसे ही संबंधों में एक है- समलैंगिक संबंध। जिसका अर्थ किसी पुरुष के पुरुष से या किसी स्त्री के स्त्री से जिस्मानी ताल्लुकात से है।

भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने हाल ही में मैक्सिको में एड्स पर आयोजित कार्यशाला में समलैंगिक संबंधों की वकालत कर एक नई चर्चा को जन्म दिया है। पश्चिमी देशों में भले ही इन संबंधों को जायज करार दिया गया हो परंतु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 इन संबंधों को अप्राकृतिक करार देती है।

* समलैंगिक संबंध कितने अनुचित:-
भारतीय सामाजिक ताने-बाने में समलैंगिक संबंधों का कोई स्थान नहीं है। यहाँ मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी मानते हुए समाज से उसके संबंधों की व्याख्या एक पवित्र रिश्ते के रूप में परिभाषित की जाती है।

  भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने हाल ही में मैक्सिको में एड्स पर आयोजित कार्यशाला में समलैंगिक संबंधों की वकालत कर एक नई चर्चा को जन्म दिया है।      
भोगप्रधान संस्कृति में भले ही इन अप्राकृतिक संबंधों की नीव में भले ही उन्मुक्त और स्वच्छंद संबंधों की दलीलें देकर 'फ्रेंक लाईफ स्टाईल' को अपनाया जाता हो परंतु इस देश में न तो ऐसी दलीलों का कोई आधार है और न ही ऐसे संबंधों की कोई पृष्ठभूमि।

रहा सवाल समलैंगिक संबंधों की पक्षधरता के लिए ऐसे रिश्तों की बुनियाद पर एड्स जैसी बीमारियों की रोकथाम का। उस पर रामदास का समलैंगिक संबंधों से एड्स की रोकथाम का तर्क सही अर्थों में एड्स को रोक पाने की सरकारी नाकामयाबी को दर्शा रहा है। जिन संबंधों को भारत में कानूनन रूप से अमान्य घोषित किया गया हो उनकी वकालत स्वयं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा किया जाना अपने पीछे कई सवालों को उकेर रहा है
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