आज हम सभी वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की होड़ में लगे हैं। अच्छी नौकरी, बढि़या आमदनी अब हमारी प्राथमिकता बन गई है। बदलते वक्त के साथ आज हम अपने करियर के प्रति तो गंभीर हुए हैं किंतु अपने परिवार के प्रति नहीं।वर्तमान परिदृश्य में पहले से सबकुछ बदल गया है। पहले के जमाने में केवल पुरुष नौकरी करते थे और महिलाएँ घर का कामकाज व बच्चों की देखभाल करती थीं। बस ऐसे ही उसकी सारी उम्र गुजर जाती थी। | | कहते हैं विवाह की एक सही उम्र होती है परंतु आज की महात्वाकांक्षी महिलाएँ मानती हैं कि 'पैसा कमाने की भी वही उम्र होती है।' कुछ यही द्वन्द्व आज की युवा महिलाओं के दिलो-दिमाग में दिन-रात चलता रहता है। |
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आज की महिलाओं की तरह उसे अपनी पहचान बनाने की कोई चाह नहीं थी। अपने सपनों को पूरा करने की ललक, घर से बाहर निकलकर काम करने का जुनून जैसे उसके स्वभाव में ही नहीं था। वह तो बस वही काम करती थी जो उसका पति कहता था। पति को परमेश्वर मानकर उसके चरणों में जीवन बिताने वाली भारतीय नारी आज एक नए कलेवर में सामने आई है और उसका वह नया कलेवर है- कामकाजी महिला का। कहते हैं विवाह की एक सही उम्र होती है परंतु आज की महात्वाकांक्षी महिलाएँ मानती हैं कि 'पैसा कमाने की भी वही उम्र होती है।' कुछ यही द्वन्द्व आज की युवा महिलाओं के दिलो-दिमाग में दिन-रात चलता रहता है। एक तरफ करियर की चिंता और दूजी तरफ विवाह का दबाव। परिवार का दबाव, आज की युवा लड़कियों को विवाह के लिए राजी तो कर देता है पर मानसिक रूप से वे उसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाती हैं जिससे विवाह के कुछ माह तक तो सबकुछ ठीक-ठाक चलता है किंतु उसके बाद परेशानियाँ दस्तक देने लगती हैं जिससे आए दिन पति-पत्नी में विवाद होते हैं। |