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काश! मैं लड़का होती' की मानसिकता  Search similar articles
- डॉ. भारती जोशी

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अधिकांश स्त्रियों के दिल में पुरुषों को स्वच्छंद रूप से घूमने फिरने तथा चिंतामुक्त जीवन व्यतीत करते हुए देखकर एक अचेतन में छिपी इच्छा प्रज्वलित होने लगती है। काश! मैं भी लड़का होती या यदि मैं पुरुष होती तो यह करती, वह करती, पर कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि लड़की है न' आदि-आदि।

आपने कभी विचार किया है कि इन वाक्यों में इतनी बेबसी क्यों झलक रही है? इस बेबसी का कारण स्त्री स्वयं है जो अपने में निहित गुणों से अपरिचित है। या उन गुणों को अपनी कमजोरी के आवरण के रूप में देखती है।

दूसरा प्रमुख कारण समाज द्वारा उसके आसपास खींच दी गई लक्ष्मण रेखा है। जहाँ एक ओर स्त्री की कोमल शारीरिक संरचना, शर्मीलापन, भावुक स्वभाव उसे आगे बढ़ने से रोकता है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत सामाजिक परिवेश की वजह से एक अज्ञात भय का भूत बचपन से ही उसके सिर मढ़ दिया जाता है। मसलन अरे ऐसे मत बैठो, भैया के साथ जाओ, ऐसे कपड़े नहीं पहनो, उससे बात नहीं करो। दाँत निकालकर क्या हँस रही हो, कॉलेज से सीधी घर आना, धीरे बोलो आदि।
  अधिकांश स्त्रियों के दिल में पुरुषों को स्वच्छंद रूप से घूमने फिरने तथा चिंतामुक्त जीवन व्यतीत करते हुए देखकर एक अचेतन में छिपी इच्छा प्रज्वलित होने लगती है। काश! मैं भी लड़का होती या यदि मैं पुरुष होती तो यह करती, वह करती, पर कुछ नहीं कर सकती, क्यों      


इस तरह के वक्तव्य सुन-सुनकर लड़की मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है। उसके मन में एक तरह की असुरक्षा की भावना जगने लगती है जो उसके कदम आगे बढ़ाने से रोकती है। उसके आत्मविश्वास में कमी आने लगती है। उसे ऐसा महसूस होने लगता है जैसे पुरुष के सहारे के बिना वह कुछ कर ही नहीं सकती। इंसानी जिंदगी में पुरुष होना ही महत्वपूर्ण है, स्त्री तो महज उसकी अनुगामिनी है। इसीलिए मन ही मन पुरुष आदर्श मान उसका अनुसरण करने लगती है और नारीत्व से घृणा।

इस तरह की मानसिकता से पीड़ित स्त्रियाँ नजर दौड़ाने पर आसपास ही मिल जाएँगी जो कपड़ों, बालों की शैली, बातचीत का तरीका, पुरुषों की तरह अपनाकर कुछ हद तक अपने अहं को संतुष्ट करने में लगी रहती हैं। सही मायने में यह सार्थक रास्ता कभी नहीं हो सकता। यह आधुनिकता की बलिवेदी पर पुरुष का पिछलग्गू बनना ही है और स्वयं अपना अस्तित्व विलीन करना।

चाहे घर की चहारदीवारी में बंद अबला हो या पाश्चात्य सभ्यता के रंगों में डूबी आधुनिका, अपने नारीत्व पर अफसोस करना या हेयदृष्टि से देखने पर सृष्टि के नियमों को बदला नहीं जा सकता है। प्रकृ‍ति ने संसार को गतिमान बनाए रखने के लिए ही स्त्री और पुरुष की रचना की है तथा दोनों में पूरक गुणों का समावेश किया है। जो विशिष्ट गुण स्त्री में निहित हैं उनसे स्त्री वंचित है। दोनों के गुणों का योग जीवन की पूर्णता है। इसीलिए प्रकृति ने जो भी गुण बख्शे हैं, उन्हें कमजोरी की तरह अपनाना मूर्खता ही होगी, स्त्री होना कमजोरी की निशानी नहीं बल्कि शक्ति का प्रतीक है।

नारी सुलभ गुणों में कोमलता, लज्जा, दया, प्यार, ममता, सौंदर्य कलात्मकता, भावुकता, वाकपटुता और तीक्ष्ण बुद्धि आदि का समावेश है। स्त्री ही है जो अपने आपको हर परिस्थिति में समायोजित रखने की क्षमता रखती है। यदि शक्ति स्वरूपा अपने नारीत्व पर गर्व कर हिम्मत और लगन से कँटीली राह पर भी अग्रसर हो तो ऐसी कोई मंजिल नहीं जहाँ वह पहुँच नहीं सकती।
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