- निर्मला भुराड़िया हालाँकि मेरी यह मित्र अपनी आत्मकथा जारी करने के मूड में है, फिर भी मैं उसका नाम बदलकर लिखूँगी, क्योंकि उसकी बात सार्वजनिक करना मेरे अधिकार-क्षेत्र में नहीं है। तो चलो कहें कविता। कविता ने अपने से दुगुनी उम्र के व्यक्ति से शादी की थी। अब उनका रिश्ता कल्पनातीत झंझावातों के दौर से गुजर रहा है।
झगड़े के कुछ मुख्य बिंदु यूँ हैं- पति का कविता पर बेइंतहा शक करना। कविता के अपने भाई-भतीजों तक से मिलने-जुलने पर एतराज करना। उसके खिड़की पर खड़े होने तक पर जल-भुन जाना। कविता को भी पहले 'पॉवरफुल' व्यक्ति के रूप में पसंद आने वाले उस पुरुष में कुंठित अधेड़ दिखने लगा है। उसे शिकायत है कि वह उसके हमउम्रों की तरह 'चीअरफुल' नहीं है। घर घुस्सू है, बाहर जाने के बजाय बैठकर टीवी देखना पसंद करता है, उसका झुकाव धार्मिक रीति-रिवाजों की तरफ ज्यादा ही होने लगा है वगैरह, वगैरह।
जब कविता से पूछा कि जो मुश्किलें वह बता रही है, उसका अनुमान उसने तब क्यों नहीं लगाया जब वह अपने से दुगुनी उम्र के पुरुष से विवाह करने का निर्णय ले रही थी? तो कविता ने जो जवाब दिया वह कविता के सोच पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है। उसका जवाब था कि वह एक'आधुनिक स्त्री' है अतः उम्र के अंतर को नहीं मानती, जो पसंद आए उससे शादी करने का हक रखती है।
कविता थोड़ा पलटकर समाज के अतीत में झाँकती तो यह समझ पाती कि आधुनिक नहीं अपितु दरअसल बेहद दमनकारी और पुरातनपंथी सोच यह मानता रहा है, कि लड़की कितनी भी छोटी हो उसकी उससे बहुत बड़े पुरुष से भी शादी की जा सकती है। इन्हीं पुरातनपंथी स्वार्थी तत्वों ने 'पुरुष कभी बूढ़ा नहीं होता' जैसी उक्तियाँ चलाई थीं।
'स्त्री को रजस्वला होने के पूर्व ही ब्याह दो' जैसी बातें भी उसी दमनकारी सोच का प्रतिफल थीं। फिर पुराने जमाने में विधवा विवाह चूँकि असंभव था (चाहे लड़की बाल विधवा ही क्यों न हो) और तलाक की अवधारणा नहीं थी और चूँकि प्रसव इत्यादि में पत्नियों के काल-कवलित होते जाने पर पुरुष तो दूसरा, तीसरा, चौथा कितने भी विवाह कर सकता था तो उस पुनर्विवाह के लिए ऐसी ही लड़कियाँ मिलती थीं जो कुँवारी हों और संभवतः रजस्वला होने की उम्र के आसपास की हों।
इस तरह अल्हड़ किशोरियाँ बड़े प्रतिशत में उन अधेड़ों को ब्याह दी जाती थीं, जिनके बच्चे ही कई बार उनके समवयस्क होते थे। पुरुष की उम्र कोई पूछता नहीं था, लड़की की उम्र के बारे में कोई समझना नहीं चाहता था। उसकी दैहिक इच्छाएँ, उसके सपने, उसके अरमान इन सबको जानने का तो सवाल ही कहाँ था। अमृतलाल नागर के उपन्यास 'नाच्यो बहुत गोपाल' की नायिका को बूढ़े पति के सान्निध्य में रहने से हिस्टीरिया के दौरे पड़ने लगते हैं।
प्रेमचंद के उपन्यास 'निर्मला' में निर्मला के पति मुंशी तोताराम अपनी पत्नी और बेटे के संबंधों पर ही शक करने लगते हैं, क्योंकि बेटा पत्नी के समवयस्क है। उस समय के कई लेखकों-साहित्यकारों ने इसी तरह समाज की सही तस्वीर पेश की थी ताकि प्रगतिशीलता का आगाज हो सके। अतः अब हम प्रगतिशीलता के नाम पर ही उलटी यात्रा शुरू नहीं कर सकते। जब यह गायाजाता हैं 'ना उम्र की सीमा हो... जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन...।' तब ना उम्र की सीमा हो का मतलब यह भी तो हो सकता है न कि जवानी की उम्र निकल जाने पर भी प्यार बरकरार रहे।
इस मामले में अपना उल्लू सीधा करने वाली व्याख्याओं पर जाने से क्या फायदा। बल्कि उम्र की सीमा तय हो तो स्त्रियाँ दैहिक शोषण से भी बच सकेंगी। शिक्षकों द्वारा किशोरियों के यौन शोषण के किस्से हम रोज पढ़ रहे हैं। तो क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि फलाँ उम्र की किशोरी गुरु द्वारा 'पुत्रीवत' समझी जाए। हालाँकि इसके लिए यह भी जरूरी है कि आधुनिक लड़कियाँ भी गुरु को पितृसम समझें। बेटी संबोधन को अपनी सेक्स अपील के खिलाफ न समझें।
मामला शादी का हो तो उम्र के अंतर में कॉम्पेटिबिलिटी का सवाल भी अपनी जगह होता ही है। 'समवयस्कता' पारस्परिकता का एक बड़ा तत्व है। ताज्जुब होता है जब आज भी अरेंज की गई शादियों तक में भी पति-पत्नी के बीच उम्र के दस-दस साल के अंतर को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है। कुंडली, आदि इत्यादि सौ गुण मिलाने वाला समाज उम्र मिलाना तो भूल ही जाता है। निश्चित ही यह संकीर्णता है, आधुनिकता तो कतई नहीं।
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