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हमें सेवा नहीं ‘मेवा’ चाहिए
- अखिलेश श्रीराम बिल्लौरे

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21वीं सदी महिलाओं की होगी। इसमें कोई संशय नहीं है। समय के साथ-साथ सासुओं में भी बदलाव आने लगा है। वे अपनी बहू से अब सेवा नहीं ‘मेव’ चाहती हैं। प्राचीन समय में सास सेवा-मेवा दोनों चाहती थीं, पर मेवा एक बार और सेवा ‍जीवनभर। लेकिन अब सेवा कभी नहीं और मेवा जीवनभर चाहती हैं। इसका एक उदाहरण हाल ही में एक समाज द्वारा आयोजित परिचय सम्मेलन में देखने को मिला।

इस परिचय सम्मेलन में एक परिचित ने मुझे आमंत्रित किया था। उनकी लड़की को मैं बहन मानता हूँ। उसी की शादी करना थी। अत: उस परिवार के आग्रह पर मैं भी परिचय सम्मेलन में शामिल हुआ था। बहना ने मुझे वहाँ उपस्थित एक लड़का बताया और कहा कि मुझे वह पसंद है।

मैंने उस लड़के के बारे में खोजबीन शुरू कर दी। व्यावहारिक और मिलनसार जानकर मेरी उससे मिलने की उत्सुकता बढ़ी। उसने बातचीत में मुझसे कहा- मेरी माँ से आपकी मुलाकात जरूरी है। संयोग से उसकी माँ भी वहाँ आ गईं। सामान्य शिष्टाचार की औपचारिकता निभाकर हम मूल उद्देश्य पर आए। चूँकि मेरी बहना मात्र 12वीं कक्षा तक पढ़ी है और मामूली सा कम्प्यूटर ज्ञान है। सेवाभावी है। क्योंकि उसने बीमार दादाजी की उनके निधन तक इतनी सेवा की कि सारा मोहल्ला उसकी सराहना करता है।
  21वीं सदी महिलाओं की होगी। इसमें कोई संशय नहीं है। समय के साथ-साथ सासुओं में भी बदलाव आने लगा है। वे अपनी बहू से अब सेवा नहीं ‘मेवा’ चाहती हैं। प्राचीन समय में सास सेवा-मेवा दोनों चाहती थीं, पर मेवा एक बार और सेवा ‍जीवनभर।      


बहना का पूरा बायोडाटा जानकर वह संभ्रांत महिला बोली- सर, मुझे तो एक भी दिन बहू से सेवा नहीं करवानी है। मुझे तो ऐसी बहू चाहिए जो नौकरी वाली हो। आज के जमाने में लड़का-बहू दोनों कमाएँ तो ही घर-परिवार चलता है। एक की कमाई से घर थोड़े ना चलता है। आपकी बहना मात्र 12वीं पास है। उसे कौन अच्छी तनख्वाह देगा।

किसी छोटे-मोटे स्कूल से मात्र 1000-1200 रुपए ही ला पाएगी। इससे क्या होगा? बातों ही बातों में उन्होंने अपने पुत्र का राज खोला कि वह बीकॉम पास है और किसी निजी फर्म में नौकरी करता है और 6000 रु. महीना कमाता है। मैं समझ गया कि आज भी दहेज यदि नहीं चाहिए तो कम से कम नौकरी वाली लड़की तो चाहिए ही

इस घटना से मुझे रत्तीभर भी हैरानी नहीं हुई। मैं जानता था कि अब जमाना बदल चुका है। लड़कियों को उनकी इच्छानुसार वे जहाँ तक पढ़ना चाहें पढ़ाना जरूरी है। नहीं भी पढ़ना चाहे तो भी उनको मन मारकर पढ़ना चाहिए। सरकार ने भी नारा दिया है कि नारी अगर शिक्षित होगी तो दो परिवारों का भला होगा।
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