- भारती पंडित
दहेज जैसी कुरीति की भर्त्सना तो दूर, कई बार लड़कियाँ खुद अपने माता-पिता से दहेज की वस्तुओं की माँग कर डालती हैं। कभी लाड़ से, तो कभी जबर्दस्ती या आँसुओं का हवाला देकर। अधिकांशतः ऐसी माँग दिखावे की भावना से की जाती है, पर उस समय बचपन से माता-पिता और मायके से जुड़ी युवतियाँ यह भी भूल जाती हैं कि मायका सक्षम है या नहीं।
मेरी एक परिचिता की बेटी की शादी तय हुई। परिचिता की आर्थिक स्थिति साधारण ही है और जीवनभर इसी आर्थिक तंगी के चलते माता-पिता के साथ बच्चों को भी कई समझौते करने पड़े। शादी तय होते ही मानो बेटी को अपनी दबी हसरतें पूरी करने का मौका मिल गया।
महँगे गहने, ब्रांडेड कपड़े, प्रसाधन सामग्री, जूते-चप्पल जैसी (वो भी महँगी से महँगी) दुनियाभर की आवश्यक-अनावश्यक वस्तुएँ उसकी सूची में शामिल हो गईं। 'शादी एक ही बार तो होती है' कहकर माता-पिता भी कुछ न बोले, मगर शादी का बजट जरूर बढ़ता गया और अगले कई वर्षों तक माता-पिता कर्ज के बोझ तले दब गए।
रीना की इच्छा महँगी गाड़ी लेने की थी। अब मंगेतर के पास गाड़ी नहीं थी, सो रीना ने फोन पर उसे ही सलाह दे डाली कि दहेज की सूची में गाड़ी पहले स्थान पर रख दें... रीना का मंगेतर अच्छी नौकरी में होने से पहले ही उसका विवाह मूल्य (?) ज्यादा था अर्थात शादी राजसी ठाठ-बाट से करने की माँग थी, उस पर गाड़ी का खर्च रीना के पिता की कमर तोड़ने के लिए काफी था। अब उन्होंने जैसे-तैसे रीना की शादी तो निबटाई मगर अपना सारा फंड खत्म करके बुढ़ापे का सहारा गँवा बैठे। | | मेरी एक परिचिता की बेटी की शादी तय हुई। परिचिता की आर्थिक स्थिति साधारण ही है और जीवनभर इसी आर्थिक तंगी के चलते माता-पिता के साथ बच्चों को भी कई समझौते करने पड़े। शादी तय होते ही मानो बेटी को अपनी दबी हसरतें पूरी करने का मौका मिल गया। |
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शानू तो इनसे भी सौ कदम आगे निकली। उसकी छोटी बहन उससे करीब दस साल छोटी थी। उसका विवाह शानू से बारह साल बाद हुआ... तब तक दहेज के नाम पर कई नई वस्तुएँ- गहने बाजार में थे। साथ ही शानू के माता-पिता भी पहले की तुलना में सुदृढ़ हो गए थे।
शानू ने जैसे ही बहन को भेंट दी जाने वाली वस्तुएँ देखी, स्वयं को मिली वस्तुओं से तुलना कर उसने ऐसा हल्ला मचाया कि मजबूरन माता-पिता को उसे भी वे वस्तुएँ देनी पड़ी। शानू की जिद तो पूरी हो गई, मगर क्या मायके में उसका सम्मान कायम रह सका?
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