मुख पृष्ठ > विविध > उर्दू साहित्‍य > नई शायरी > दिल ही दुखाने के लिए आ
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
दिल ही दुखाने के लिए आ
अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल
NDND
रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम1 न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम2 को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़ते-गिरिया3 से भी महरूम
ऐ राहते-जां मुझको रुलाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत4 का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

माना कि मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

1. मेल-जोल, 2. शीघ्र बात समझ जाने वाला दिल 3. आँसुओं का स्वाद, 4. प्यार का ख़याल
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
रेहबर इन्दौरी
रुपायन इन्दौरी के क़तआत
बेकल उत्साही की ग़ज़ल
आप से बात करेंगे कभी तन्हाई में
मुनव्वर राना की ग़ज़लें (1)
त्रिमोहन की ग़ज़लें