- रमेश सिन्हा नसीम
1. बे का जान ए दोस्ती बे का जाने प्यार एक हाथ में फूल है दूजे में तलवार
का उपजत है कोख में अब ये देखा जाए बेटा है तो ख़ैर है बेटी जनम न पाए
नीम करेला हो गए जिन लोगन के बोल दाता उनकी जीभ पे कुछ तो मीठा घोल
चल गोरी बा देस में आँख हरी हो जाए ऐसे में कैसे रहें पेड़ दाँतरू खाए
गाँव छोड़ के मैं चला पल पल मन घबराए जैसे आगे पग धरूँ एड़ी मुड़-मुड़ जाए
माँ बाँटी दो भाग में दिल पे गाढ़े तार बड़ा रहे इस पार तो छोटा है उस पार
हर दिन माटी खोद के ऐसे भए निहाल सारा जीवन खा गए लकड़ी आटा दाल
समय बड़ा बलवान है छोड़े ऐसे तीर सोने में तोले कभी कर दे कभी फ़क़ीर
दया-धरम को आज तो दिया सभी ने छोड़ नस-नस में से ख़ून को हँस-हँस लिया निचोड़
सुनकर मेरी बात को ख़ून गया था खोल नीम-करेला हो गए साँचे साँचे बोल
क़र्ज़ बक़ाया बाप का था बेटे के नाम काट अँगूठा ले गया बेटा बना ग़ुलाम
दरदों की दीवार पर नासूरी ऐ फूल हर दिन शबनम आँख की धोती रहती धूल।
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