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बे का जान ए दोस्ती
दोहे
- रमेश सिन्हा नसीम

1.
Naseem Sinha
Aziz AnsariWD

बे का जान ए दोस्ती बे का जाने प्यार
एक हाथ में फूल है दूजे में तलवार

का उपजत है कोख में अब ये देखा जाए
बेटा है तो ख़ैर है बेटी जनम न पा

नीम करेला हो गए जिन लोगन के बोल
दाता उनकी जीभ पे कुछ तो मीठा घो

चल गोरी बा देस में आँख हरी हो जाए
ऐसे में कैसे रहें पेड़ दाँतरू खा

गाँव छोड़ के मैं चला पल पल मन घबरा
जैसे आगे पग धरूँ एड़ी मुड़-मुड़ जा

माँ बाँटी दो भाग में दिल पे गाढ़े ता
बड़ा रहे इस पार तो छोटा है उस पा

हर दिन माटी खोद के ऐसे भए निहाल
सारा जीवन खा गए लकड़ी आटा दा

समय बड़ा बलवान है छोड़े ऐसे ती
सोने में तोले कभी कर दे कभी फ़क़ीर


दया-धरम को आज तो दिया सभी ने छोड
नस-नस में से ख़ून को हँस-हँस लिया निचोड

सुनकर मेरी बात को ख़ून गया था खोल
नीम-करेला हो गए साँचे साँचे बो

क़र्ज़ बक़ाया बाप का था बेटे के ना
काट अँगूठा ले गया बेटा बना ग़ुला

दरदों की दीवार पर नासूरी ऐ फूल
हर दिन शबनम आँख की धोती रहती धूल।
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