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सुतून ऐ दार
ग़ज़ल
- रशीद इंदौरी

Rasheed Indori
Aziz AnsariWD
सुतून ऐ दार की उँचाई से न डर बाबा
जो हौसला है तो इस राह से गुज़र बाबा

ये देख जु़लमत ए शब का पहाड़ काट के हम
हथेलियों पे सजा लाए हैं सहर बाबा

मिली है तब कहीं इरफ़ान ए ज़ात की मंजिल
खुद अपने आपमें सदियों किया सफ़र बाबा

बुलंदियाँ भी उसे ‍सर उठा के देखती हैं
सुतून ए दार की ज़ीनत बने जो सर बाबा
और भी
कल तो इक सिकन्दर था
बादल दरिया पर बरसा हो
ग़ज़ल