ग़ालिब, नदीम ए दोस्त से आती है बू ए दोस्त मशगूल ए हक़ हूँ बन्दगी ए बूतराब में
छोड़ा ना रश्क ने कि तेरे घर का नाम लूँ हर इक से पूछ्ता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं करते किस मुँह से हो ग़ुरबत की शिकायत ग़ालिब तुमको बेमेहरी ए यारान ए वतन याद नहीं
दोनों जहान दे के वो समझे ये खुश रहा याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें
थक-थक के हर मुक़ाम पे दो चार रह गए तेरा पता ना पाएँ तो लाचार क्या करें
वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते है
कभी जो याद भी आता हूँ मैं तो कहते हैं कि आज बज़्म में कुछ फ़ितना ओ फसाद नहीं
यारब ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए लोह ए जहाँ पे हर्फ ए मुकर्रर नहीं हूँ मैं
सब कहाँ कुछ लाला ओ गुल में नुमायाँ हो गईं खाक में क्या सूरतें होंगी के पिन्हाँ हो गईं
हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम एक मर्ग ए नागहानी और है
क़ैद में याकूब ने ली गो न युसुफ़ की खबर लेकिन आँखें रोज़न ए दीवार ए ज़िन्दाँ हो गईं
नीन्द उसकी है, दिमाग उसका है, रातें उसकी हैं जिसके बाज़ू पर तेरी ज़ुल्फें परेशाँ हो गईं
क़ैद ए हयात ओ बन्द ए ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ
ना लुटता दिन को तो कब रात को यूँ बेखबर सोता रहा खटका ना चोरी का दुआ देता हूँ रेहज़न को
जब मैकदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद मस्जिद हो, मदरसा हो, कोई खानक़ाह हो
सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ सब दुरुस्त लेकिन खुदा करें वो तेरी जलवा गाह हो
मै से ग़रज़ निशात है किस रूस्याह् को इक गूना बेखुदी मुझे दिन-रात चाहिए
ज़िन्दगी अपनी जब इस तरहा से गुज़री ग़ालिब हम भी क्या याद करेंगे के खुदा रखते थे
अपनी गली में दफ़्न न कर मुझको बाद ए क़त्ल मेरे पते से खल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले
देके खत मुँह देखता है नामाबर कुछ तो पैग़ाम ए ज़ुबानी और है
हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम एक मर्ग ए नागहानी और है |