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नज़्म : शायर-ए-आज़म, दिलावर फ़िगार  Search similar articles
कल इक अदीब-ओ-शायर-ओ-नाक़िद मिले हमें
कहने लगे कि आओ ज़रा बहस ही करें

करने लगे ये बहस कि अब हिन्द-ओ-पाक में
वो कौन है कि शायर-ए-आज़म कहें जिसे

मैंने कहा जिगर तो कहा डेड हो चुके
मैंने कहा कि जोश कहा क़द्र खो चुके

मैंने कहा फ़िराक़ की अज़मत पे तबसिरा
बोले फ़िराक़ शायर-ए-आज़म अरा ररा

मैंने कहा कलाम-ए-रविश लाजवाब है
कहने लगे कि उनका तरन्नुम खराब है

मैंने कहा कि फ़ैज़ तो बोले कि रेड हैं
मैंने कहा हफ़ीज़ तो बोले कि पेड हैं

मैंने कहा तरन्नुम-ए-अनवर पसन्द है
कहने लगे कि उनका वतन देवबन्द है

मैंने कहा कि साहिर-ओ-मजरूह-ओ-जाँनिसार
बोले कि शायरों में न कीजिए इन्हें शुमार

मैंने कहा कि रंग नया है नशूर का
बोले ख्याल ठीक नहीं है हुज़ूर का

मैंने कहा कुछ और तो बोले कि चुप रहो
मैं चुप रहा तो कहने लगे और कुछ कहो

मैंने कहा कि शाद तो बोले स्टाइरिस्ट
मैंने कहा नदीम तो बोले कि जरनलिस्ट
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