इन्दौर से धार ज़्यादा दूर नहीं है। आबादी और रक़बे में इन्दौर से धार बहुत छोटा है, इन्दौर एक सिनअती शहर है तो धार के लोगों की रोटी-रोज़ी का अहम ज़रीआ ज़राअत और ज़राअत से जुड़े दीगर काम हैं। लेकिन अदबी सरगरमी का ज़िक्र जब भी होता है तो इन्दौर के साथ धार का नाम भी ज़रूर लिया जाता है।
जनाब निसार अहमद साहब जो पेशे से वकील हैं, धार में अदबी सरगरमी के रूहेरवाँ हैं। आपकी कोशिशों से हर साल धार में एक शानदार उर्स होता है जिसमें हिन्दुस्तान का बड़े से बड़ा क़व्वाल शरीक होकर अपने फ़न का मुज़ाहिरा करने में अपनी शान समझता है। अच्छी और सूफ़ियाना क़व्वाली के शौक़ीन दूर दूर से यहाँ आकर रात-रात भर क़व्वाली से लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं और साल भर तक यहाँ होने वाली क़व्वाली का इंतज़ार करते हैं।
इसी तरह शेर-ओ-शायरी की नशिश्तें यहाँ होती रहती हैं और साल में एक-दो बडे मुशायरे भी मुनअक़िद हो जाते हैं। ये सिलसिला गुज़िश्ता कई दहाइयोँ से जारी है। जनाब निसार अहमद के दोस्तों का हल्क़ा बड़ा वसी है, अपने इन हमनवाओं की मदद से बड़े से बड़ा काम निसार साहब बड़ी खूबी से अंजाम दे लेते हैं। खुद भी एक पुराने और अच्छे कहानीकार हैं, इसलिए फ़नकारों के जज़बात और हालात से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं। जो भी फ़नकार धार आता वो खुश होकर यहाँ से जाता है। अपनी अदबी खिदमात का दायरा आजकल आपने और वसी कर दिया है।
ये खिदमत है फ़न-कारों के फ़न को किताबी शक्ल में अवाम के सामने लाना। दरगाह और उर्स से मुताल्लिक़ एक अच्छी किताब 'यादगार-ए-कमाल' आप शाए कर चुके हैं। हाल ही में आपने धार के ग़ज़लगो शायरों और कवियों के कलाम को बड़ी मेहनत से यकजा कर, चमन-दर-चमन के नाम से शाए किया है। धार में अपनी तरह की ये पहली कोशिश है। इस किताब में नए-पुराने कुल इकतालीस फ़नकार शामिल हैं। इन में पाँच खातून फ़नकारों के नाम भी नुमायाँ हैं।
बात खातून फ़नकारों की चली है तो मोहतरमा शांति सबा का ज़िक्र भी हो जाए। उन्हें गुज़रे ज़्यादा अरसा नहीं बीता है। बीस बाईस साल पहले इस नाम ने न सिर्फ़ मध्य प्रदेश के बल्कि पूरे मुल्क में मुनअक़िद होने वाले मुशायरों में धूम मचा दी थी। अपने साथियों और छोटे-बड़े शायरों का एहतेराम करने वाली इस खातून को खुदा ने पुरकशिश शख्सियत और बहतरीन सुरीली आवाज़ से नवाज़ा था।
| | बीस बाईस साल पहले इस नाम ने न सिर्फ़ मध्य प्रदेश के बल्कि पूरे मुल्क में मुनअक़िद होने वाले मुशायरों में धूम मचा दी थी। अपने साथियों और छोटे-बड़े शायरों का एहतेराम करने वाली इस खातून को खुदा ने पुरकशिश शख्सियत और बहतरीन सुरीली आवाज़ से नवाज़ा था। |
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शांति सबा (मरहूम) * आपका ज़िक्र हो रहा है कहीं वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है
* बना लिए हैं ज़माने ने कितने अफ़साने बस एक बार तेरी रेहगुज़र से गुज़रे हैं
* ये आरज़ू थी हमें ज़िन्दगी में प्यार मिले क़दम क़दम पे हमें ग़म ही बार-बार मिले
* कर्बला की हमें तारीख बताती है यही खुद ही मिट जाएगा इक रोज़ मिटाने वाला
मुमताज़ हुसैन मुमताज़ (मरहूम) * आप आए तो हयात आई, क़ज़ा लौट गई और क्या इस के सिवा आके मसीहा करते
* लब पर हयात बख्श तबस्सुम है आपके आँखों में बिजलियाँ हैं क़ज़ा की छुपी हुई
हयात हाशमी (मरहूम) *आबगीनों की तरह दिल हैं ग़रीबों के 'हयात' टूट जाते हैं कभी तोड़ दिए जाते हैं ------------(ये ग़ज़ल न जान ए कैसे शमीम जयपुरी के नाम से मंसूब हो गई है।)
* दावत-ए-ग़म क़ुबूल की हमने फिर भी एहसान-ए-दोस्ताँ ही रहा
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