आज चारों तरफ महिलाएँ हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। कोई भी क्षेत्र हो, महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आज की महिला जिस जवाबदारी से व्यावसायिक दुनिया में सफल हो रही है, उतनी ही कुशलता से वह घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी भी निभा रही है।
महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा लगनशील, मेहनती व दृढ़ संकल्प वाली होती हैं। इन सबके बावजूद आज भी वे अपनी पहचान बनाने में असमर्थ हैं। | | आज के पुरुष प्रधान समाज में चाहे महिला कितनी ही तरक्की कर ले, उसे पुरुष के अहं को झेलना ही पड़ता है। अगर वह सुख-शांति चाहती है और अपना अस्तित्व बनाए रखना चाहती है तो यह कोई आसान खेल नहीं है। समझौता औरत का दूसरा नाम है। |
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समाज में आज भी विवाहित स्त्री को ज्यादा मान व इज्जत की नजर से देखा जाता है या तो वह आजीवन अविवाहित रहे तो बात अलग है। अगर वह मान सम्मान चाहती है तो चाहे फिर उसका मन मिले या न मिले, सब की भलाई के लिए उसे पति के साथ ही रहना पड़ता है।
आज के पुरुष प्रधान समाज में चाहे महिला कितनी ही तरक्की कर ले, उसे पुरुष के अहं को झेलना ही पड़ता है। अगर वह सुख-शांति चाहती है और अपना अस्तित्व बनाए रखना चाहती है तो यह कोई आसान खेल नहीं है। समझौता औरत का दूसरा नाम है।
बहुत कम ऐसे पुरुष होंगे, जो अपनी पत्नी की तरक्की में मन से खुश होते हैं। ज्यादातर पति उसमें अपने अहं को ठेस पहुँचना मानते हैं।
भारतीय नारी में सहनशीलता कूट-कूटकर भरी होती है, जिसके कारण वह ज्यादातर बिना शिकायत के अपना जीवन अपने पति, बच्चों व घरवालों की खुशी के लिए काट देती है।
बात की गहराई भी इसी में है, क्योंकि अपनी पहचान बनाने में उसका बहुत कुछ दाँव पर लग जाएगा और हाथ आएगा मानसिक संताप।
क्या वह सफलता पाने के लिए अपना घर, बच्चों की खुशी स्वाहा करना चाहेगी? यही फर्क है दुनियाभर की महिलाओं में और भारतीय महिलाओं में।
आज भारत में अपेक्षाकृत ज्यादा सुख-शांति है और लोग परिवार को सबसे प्रथम स्थान देते हैं। है न सच?
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