एहसासों के परिंदेअरमानों के पर लगाउड़ने लगे हैंप्रेम के आकाश में निर्द्वन्द्व व स्वच्छंद अनजान जगहों पर ये खग-विहग विचरने लगे हैं स्वप्न को साथी बना अब झुंड से बाहर अपने ही एकाकीपन में मग्न होकर मदमस्त उड़ने लगे हैं...कब तक उड़ेंगे पर लगा? तब तक उड़ेगें पर लगाजब तक की श्वास साथ है मन में प्रीत का प्रिय भाव हैतब तक उड़ेंगे पर लगाजब तक प्रेम का आकाश है...। |