आँखे खुली और दिखा विशाल आकाश निश्छल व निराधार देखता धरा को एकटक दूर से ही देखकर प्रसन्न होता नभ अपार
धरा की छटा पर इठलाता वह बार-बार जानता है वह कि मिलन-क्षितिज है मिथ्या फिर भी अपने प्रेम की बरसाता है वह फुहार सिंचिंत करने को धरा बहाता वह अश्रुधार
स्पर्श करे या न करे पर कवच बन देता धरा को अपना प्रेम अपार...
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