प्रिय विद्यार्थियों, स्नेहिल शुभकामनाएँ आज शिक्षक दिवस है। दिवसों की भीड़ में एक और दिवस! कहने को आज मैं आपकी शिक्षिका हूँ, किंतु सच तो यह है कि जाने-अनजाने न जाने कितनी बार मैंने आपसे शिक्षा ग्रहण की है।
कभी किसी के तेजस्वी आत्मविश्वास ने मुझे चमत्कृत कर दिया तो कभी किसी विलक्षण अभिव्यक्ति ने अभिभूत कर दिया । कभी किसी की उज्ज्वल सोच से मेरा चिंतन स्फुरित हो गया तो कभी सम्मानवश लाए आपके नन्हे से उपहार ने मुझे शब्दहीन कर दिया।
कक्षा में अध्यापन के अतिरिक्त जब मैं स्वयं को उपदेश देते हुए पाती हूँ तो स्वयं ही लज्जित हो उठती हूँ। मैं कौन हूँ? क्यों दे रही हूँ ये प्रवचन? आप लोग मुझे क्यों झेल रहे हैं?
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यही प्रश्न संभवत: आपके मानस में भी उठते होंगे। मैडम क्यों परेशान हो रही हैं? उन्हें क्या करना है? वे अपना विषय पढ़ाएँ और चली जाएँ। आपकी गलती नहीं है, पर गलत मैं भी नहीं हूँ। कल तक मैं भी बैंच के उस पार हुआ करती थी। आज सौभाग्यवश इस तरफ हूँ। उस पार रहकर अक्सर कुछ प्रश्न मेरे मन को मथते रहे हैं।
क्या शिक्षक मात्र किताबों में प्रकाशित विषयवस्तु को समझाने का 'माध्यम भर' है? क्यों शिक्षक अपने विद्यार्थियों से मात्र रटी हुई पाठ्यसामग्री को ही प्रस्तुत करने की अपेक्षा रखता है?
विद्यार्थियों के मौलिक चिंतन, प्रखर प्रश्नों व रचनात्मक सोच का क्या इस शिक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं?
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