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मैदान पर बोलती रही भारत की तूती
साइना नेहवाल की ऊँची उड़ान : हैदराबाद की 18 वर्षीय साइना नेहवाल बीजिंग ओलिम्पिक खेलों की बैडमिंटन प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल तक अपनी चुनौती कायम रखने में सफल हुईं। साइना भारत की ऐसी पहली बैडमिंटन खिलाड़ी बन गईं, जो क्वार्टर फाइनल तक पहुँची हैं। इस पायदान पर उन्हें इंडोनेशिया की अनुभवी खिलाड़ी मारिया किस्टीन के हाथों तीन गेमों में पराजय मिली।

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साइना ने 16 वर्ष की उम्र में 2006 में मनीला में आयोजित फोर स्टार फिलीपींस ओपन बैडमिंटन का खिताब जीतकर जो ऊँची उड़ान भरी थी, उसी का परिणाम है कि वे अपनी मेहनत के बूते इस मुकाम पर हैं। बीजिंग में साइना के प्रदर्शन ने यह तो उम्मीद जगा दी है कि उनमें असीम क्षमता है और सही मार्गदर्शन के बल पर वे 2010 के राष्ट्रमंडल खेल और 2012 के लंदन ओलिम्पिक में पदक भी जीत सकती हैं।

राज्यवर्धनसिंह नहीं कर पाए राज : बीजिंग ओलिम्पिक में भारत के निशानेबाज और ध्वजवाहक की भूमिका निभाने वाले राज्यवर्धनसिंह राठौड़ से काफी उम्मीदें थीं कि वे डबल ट्रैप निशानेबाजी में पिछली सफलता से एक पायदान ऊपर चढ़ेंगे, लेकिन क्वालीफिकेशन राउंड में ही बाहर हो जाने की वजह से वे फाइनल तक भी नहीं पहुँच सके।

सेना के इस निशानेबाज ने एथेंस ओलिम्पिक में रजत पदक प्राप्त कर पदक तालिका में भारत का नाम अंकित कराया था, लेकिन बीजिंग के मार्च पास्ट में शेरवानी पहने राज्यवर्धन जब भारतीय दल के मुखिया बनकर तिरंगा लिए चल रहे थे, तब उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था और इसी आत्मविश्वास ने उन पर उम्मीदों का बोज लाद दिया था। पूरा भारत उस समय हैरान रह गया, जब राज्यवर्धन अपने इवेंट के क्वालीफिकेशन राउंड में ही बाहर हो गए।

दम तोड़ता हॉकी के जादूगर का सपना : मेजर ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में भारतीय टीम के लिए खेले और तीनों में भारतीय टीम स्वर्ण पदक जीतकर लौटी। दादा ध्यानचंद का सपना था कि भारत का यही गौरवशाली इतिहास आगे भी जारी रहे।

ओलिम्पिक हॉकी में भारत ने कुल 8 स्वर्ण, 1 रजत और 2 काँस्य पदक जरूर जीते, लेकिन 80 साल के इतिहास में यह पहला अवसर था, जब भारतीय टीम बीजिंग ओलिम्पिक के लिए पात्रता हासिल नहीं कर सकी।

हॉकी की दुर्दशा देखकर दुःखी होना लाजिमी है। जो लोग क्रिकेट को पागलों की तरह प्यार करते हैं, उनके दिलों में हॉकी के प्रति असीम आस्था है, लेकिन इस खेल में मिली लगातार नाकामियों (2006 की एशिया कप विजय को छोड़कर) ने इस आस्था को कम करने में बड़ी भूमिका अदा की।

शतरंज में आनंद की बादशाहत : विश्वनाथन आनंद ने शतरंज के खेल में भारत को जिस ऊँचाई पर विराजमान किया, उसकी मिसाल आने वाले कई वर्षो तक दी जाती रहेगी। आनंद ने जर्मनी के बोन शहर में रूस के व्लादिमीर क्रैमनिक को हराकर विश्व शतरंज चैम्पियनशिप जीती। विश्व शतरंज में यह उनका तीसरा खिताब था। काबिले गौर है कि आनंद शतरंज की तीनों विधाओं
नाकआउट, टूर्नामेंट तथा मैच प्ले के खिताब जीतने वाले पहले शतरंज खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया है।

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जीव ने जगाई आस : गोल्फ में भारतीय मूल के ‍‍फिजी में रहने वाले विजयसिंह के बाद यदि भारत का नाम किसी ने चमकाया है तो वे जीव मिल्खासिंह ही हैं। 38 वर्षीय जीव महान धावक मिल्खासिंह के पुत्र हैं और खेलकूद उन्हें विरासत में मिला है। उनकी माँ भी वॉलीबॉल की मशहूर खिलाड़ी रहीं हैं।

मिल्खासिंह अपने बेटे को टेनिस खिलाड़ी बनाना चाहते थे, लेकिन जीव ने गोल्फ को गले लगाया। चंडीगढ़ में 1971 में जन्में जीव ने इस साल जापान टूर में गोल्फ निप्पन सिरीज जीती, जिसकी बदौलत वे दुनिया में 36वें नंबर के गोल्फर बन गए। गोल्फ रैंकिंग में इतने ऊँचे मुकाम पर पहुँचने वाले ये पहले भारतीय खिला़ड़ी हैं।

सानिया 100 से बाहर हुई : भारत की टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा के लिए यह साल कोई भी बड़ी खुशी का पैगाम लेकर नहीं आया और वर्षान्त में वे टॉप 100 खिलाड़ियों की फेहरिस्त से भी बाहर हो गईं। इसकी वजह यह रही कि वे कलाई की चोट के कारण चार महीनों तक कोर्ट से रहीं। साल के आखिरी में जब रैंकिंग जारी हुई तो उसमें यह हैदराबादी बाला 344 अंकों के साथ 101 वें नंबर पर थीं।

हैदराबाद की 22 वर्षीया सानिया ने पहली बार 2005 में चोटी की 100 खिलाड़‍ियों में जगह बनाई थी। वे पिछले साल अगस्त में अपने करियर के सर्वश्रेष्ठ 27वें नंबर पर पहुँच गई थीं, लेकिन उसके बाद से उनकी रैंकिंग का गिरना जारी रहा।

हालाँकि साल की शुरुआत में होने वाले ऑस्ट्रेलियन ओपन ग्रैंड स्लैम में वे तीसरे राउंड पहुँचकर उन्होंने नई आस जगाई, लेकिन ऑपरेशन के बावजूद कलाई की चोट फिर उभर आने के कारण बीजिंग ओलि‍म्‍पिक के बाद से वे टेनिस कोर्ट पर नजर नहीं आईं। उपलब्धियों को लेकर सानिया के नाम डब्ल्यूटीए का एक एकल और सात युगल खिताब हैं। वे युगल की रैंकिंग में 61वें स्थान पर बनी हुई हैं।
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