इस तरह अर्थव्यवस्था मंदी में फँसकर रह गई। यह किसी काल्पनिक स्थिति का बखान नहीं है। अमेरिकी हाउसिंग संकट सचमुच बहुत व्यापक और गहरा है। अमेरिका में कुल आवासीय हाउसिंग संपत्ति लगभग 21 खरब डॉलर की है, जो कुल अमेरिकी पारिवारिक संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है।
इस आवासीय हाउसिंग संपत्ति की कीमत में 10 फीसदी की भी गिरावट अमेरिकी उपभोक्ताओं की खरीददारी को काफी प्रभावित कर सकती है। हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद प्रॉपर्टी बाजार की स्थिति यह हो गई कि नए मकानों के निर्माण की शुरूआत में ही करीब 47 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और जहाँ 2005 में आवासीय प्रापर्टी कुल जीडीपी का 6.3 प्रतिशत थी, वह घटकर 4.4 प्रतिशत रह गई। नए मकानों की माँग घटने के कारण निर्माण उघोग को गहरा झटका लगा। रही-सही कसर कच्चे तेल की रिकार्ड छूती कीमतों ने पूरी कर दी।
अमेरिका में कारों की घटती बिक्री की वजह से जनरल मोटर्स और फोर्ड जैसी कंपनियाँ खतरे में हैं। दोनों कंपनियों को भारी घाटा हुआ है और वे बड़े पैमाने पर छँटनी की योजनाओं की घोषणा कर चुकी हैं। बुश प्रशासन ने अर्थव्यस्था को संकट से उबारने के लिए 700 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता की घोषणा की लेकिन यह सहायता सिर्फ बड़ी वित्तीय कंपनियों को दी जा रही है। वाहन उद्योग के लिए अलग से राहत पैकेज लाया जा रहा है।
यह साफ है कि अमेरिका मंदी के जुकाम के वायरस की चपेट में आ गया और उसके लक्षण दिखने लगे हैं। ऐसे में, भारत जैसी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था को मंदी का संक्रमण भले न हो लेकिन इसे छींकने से कौन रोक सकता है। भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने के कारण संभावित अमेरिकी मंदी का असर भारत पर भी पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में इस ओर इशारा किया है।
यूपीए सरकार 11वीं पंचवर्षीय योजना में 9 से 10 फीसदी विकास दर हासिल करने के दावे करती रही है, लेकिन बाद में इस बात के आसार अधिक दिख रहे हैं कि अगले साल विकास दर चालू वर्ष के 8.5 फीसदी के अनुमान से गिरकर 7 से 7.5 प्रतिशत तक पहुँच जाए। हालाँकि इससे आसमान नहीं गिर पड़ेगा लेकिन, अमेरिकी हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद भारत को अपने प्रॉपर्टी और रीयल एस्टेट बाजार के साथ शेयर और कुछ हद तक जिंस बाजार की ‘अतार्किक उत्साह’ सें भरी तेजी में बन रहे बुलबुले को लेकर जरूर सतर्क होना पड़ेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर से ज्यादा खतरा अंदर से है।
| | इस जलजले में बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियाँ डूब गई हैं। बेरोजगारी दर नए कीर्तिमान बना रही है। मंदी की मार से भारत में छह महीने के भीतर सिर्फ आईटी और इससे जुड़े सेक्टर में ही 75 हजार से अधिक नौकरियां चली गई है |
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ग्लोबल मार्किट में हाहाकार मचा हुआ है। अमेरिका से लेकर भारत तक आर्थिक मंदी की चपेट में है। सेंसेक्स और निफ्टी हर रोज़ लुढ़क रहे हैं। शेयर मार्किट के दिग्गजों से लेकर छोटे इनवेस्टर्स सभी नुकसान उठा रहे हैं। लेकिन इस सबके बीच सबसे बड़ी चिंता है, लोगों का रोजगार छिनना।
इस जलजले में बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियाँ डूब गई हैं। बेरोजगारी दर नए कीर्तिमान बना रही है। मंदी की मार से भारत में छह महीने के भीतर सिर्फ आईटी और इससे जुड़े सेक्टर में ही 75 हजार से अधिक नौकरियां चली गई है। रीटेल सेक्टर और रीअल एस्टेट सेक्टर में नौकरियों में कटौती की जा रही है। एविएशन सेक्टर में भी मंदी की मार पड़ रही है। कई बड़ी कंपनियों ने अपने विस्तार प्लान स्थगित कर दिए हैं, जिससे नई नौकरियों की संभावना खत्म हो गई है। पर खुश होने की बात यह है कि हम इन सभी मुसीबतों पर काबू पा सकते हैं केवल हौसले की जरूरत है। |